हासिद (ईर्ष्या करने वाला) क्या करता है?

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  • Source : विलायत डाट इन
दूसरों से जलने वाला क्या करता है? वह पहले तो सामने वाले जैसा बनने की कोशिश करता है, जब नही बन पाता तो फिर अपने सामने वाले को कम करने की कोशिश करता है........

दूसरों से जलने वाला क्या करता है? वह पहले तो सामने वाले जैसा बनने की कोशिश करता है, जब नही बन पाता तो फिर अपने सामने वाले को कम करने की कोशिश करता है, जब इसमे भी नाकाम हो जाता है तो सामने वाले को बहाने से या झांसा देकर मैदान से हटाने की कोशिश करता है, जब इस दांवपेंच मे भी नाकाम हो जाता है तो सामने वाले की पीठ पीछे बुराई करके उसके कैरेक्टर को बदनाम करने का प्रयास करता है, जब खुलकर बुराई और कैरेक्टर पर धब्बा न लगा सके तो फिर इशारों और बन्द शब्दों मे अपने दिल की भड़ास निकालने की कोशिश करता है। अगर इससे भी उसकी ईर्ष्या की आग ठंडी न हो तो फिर वह इस तरह तारीफ़ करता है कि जिससे उसके आसपास के लोग बुराई करने मे उसकी हां मे हां मिलाएं। इतना सब करने के बाद भी ईर्ष्या करने वाला (हासिद) स्वयं अपनी ही नज़रों मे हारा हुआ और मरा हुआ होता है। जलने वाले को ज़िन्दा समझना ख़ुद ज़िन्दगी के साथ मज़ाक़ है। जिस तरह एक इंसान को दूसरे इंसान से जलन हो जाती है, इसी तरह कभी कभी एक देश को दूसरे देश से, एक क़बीले को दूसरे क़बीले से एवं एक संस्था को दूसरी संस्था से हसद या जलन हो जाया करती है। समझदार लोग अच्छी तरह जानते हैं कि क़ौमे आदमियों से और संस्थाएं सदस्यों से मिलकर बनती हैं। क़ौमों मे इंसानो का प्रवेश किसी हद तक इच्छा से और किसी हद तक बिना ईच्छा के होता है, जबकि संस्थाओं मे इंसानो का प्रवेश केवल अपनी इच्छा से होता है। क़ौमों मे बिना इच्छा के प्रवेश की मिसाल यह है कि, जो आदमी यहूदी परिवार में जन्म लेता है उसे हर हाल मे यहूदी ही कहा जाएगा। क़ौमों में अपनी इच्छा से शामिल होने का उदाहरण यह है कि, एक यहूदी कल्मा पढ़कर अपने पिछले यहूदी धर्म से अलग हो जाता है और अपनी इच्छा से इस्लाम धर्म का हिस्सा बन जाता है। सियासी पालीसियों के अनुसार किसी संस्था की मिम्बरशिप के लिए ऐसा नही होता कि हर इंसान जिस परिवार मे पैदा हो वह ख़ानदानी तौर पर अपने बाप दादा की पार्टी का मिम्बर भी हो। पार्टी का मिम्बर बनने के लिए उसे फ़ार्म भरने पड़ते हैं और कई तरह की ट्रेनिंग लेनी पड़ती है।जिस तरह एक समय में एक क़ौम के अन्दर कई पार्टियां हो सकती हैं, इसी तरह एक पार्टी के अन्दर भी कई क़ौमों के लोग हो सकते हैं। जिस तरह क़ौमों का निर्माण रंग, नस्ल, मज़हब, इलाक़े, ख़ानदान या दीन पर होता है, इसी तरह पार्टियों या संस्थाओं का निर्माण भी ऊपर बताए गए ग्रुपों के आधार पर होता है। आमतौर पर क़ौमें अपनी समस्याओं के हल के लिए संस्थाओं को खड़ा करती हैं। इस सच्चाई से किसी भी हालत मे इंकार नही किया जा सकता है कि जिस तरह इंसान ज़िन्दगी और मौत की हालतों से गुज़रते हैं, इसी तरह क़ौम व संस्था को भी ज़िन्दगी और मौत से पाला पड़ता है। क़ुरान-ए-मजीद के अनुसार बहुत सारे लोग, बाहर से दिखाई देने मे खाने पीने, चलने फिरने और अपनी नस्ल बढ़ाने के बावजूद मुर्दा हैं, इसी तरह बहुत सारे लोग जिनका हमारी आंखो के सामने खाना पीना, चलना फिरना और संतान पौदा करने का सिलसिला बंद हो जाता है, वह ज़िन्दा हैं और क़ुरान-ए-मजीद उन्हे शहीद की उपाधि से याद करता है। इंसानो की तरह क़ौमे और संस्थाएं भी दो तरह की हैं, कुछ ज़िन्दा हैं और कुछ मुर्दा। क़ुरान की शिक्षाओं की रौशनी मे जिस तरह इंसानों की बाहरी हरकतें ज़िन्दगी की कसौटी नही हैं, इसी तरह क़ौमों और संस्थाओं की बाहरी हरकत और गतिविधियां भी ज़िन्दगी की कसौटी नही है। हरकत के साथ साथ यह देखना भी ज़रूरी है की हरकत की दिशा क्या है, क्योंकि यह सम्भव है कि एक इंसान ज़िन्दगी की गोद मे बैठा हुआ हो, लेकिन मौत की ओर हरकत कर रहा हो और यह भी सम्भव है कि कोई इंसान मौत की छाया मे जी रहा हो, लेकिन ज़िन्दगी की ओर बढ़ रहा हो। अब्दुल्लाह इब्ने अबी जैसे बहुत से लोग दिखने मे तो पैगंम्बर-ए-इसलाम (स) की रहमतों की छाया मे ज़िन्दगी गुज़ार रहे थे, लेकिन उनकी हरकतों की दिशा बदक़िस्मती और मौत की ओर ले जाने वाली थी। इसी तरह सलमान व अबूज़र जैसे लोग इसलाम के उदय से पहले मौत और दुर्भाग्य की छाया मे जी रहे थे, लेकिन उनकी हरकत की दिशा वास्तविक जीवन की ओर थी। बाहरी रूप से दोनो तरफ़ हरकत थी, इसी हरकत ने अब्दुल्लाह इब्ने अबी को मौत तक पहुंचा दिया और इसी हरकत ने सलमान (र) व अबूज़र (र) को हमेशा रहने वाली ज़िन्दगी तक पहुंचा दिया। इसी तरह संस्थाओं की ज़िन्दगी मे भी केवल बाहरी हरकत और उनका काम करते रहना कसौटी नही है, बल्कि हरकत की दिशा को देखना आवश्यक है। यह हमारे समय की बात है कि तालिबान ने बहुत अधिक काम किया, लेकिन इसके बाद भी तालिबान मर गए, इसलिए कि उनकी हरकत की दिशा सही नही थी, लेकिन हिज़्बुल्लाह का सर ऊंचा है, इसलिए कि हिज़्बुल्लाह की हरकत की दिशा सही है, तालिबान की पालीसियां सऊदी अरब व अमेरिका से प्रभावित थीं। तालिबान की पालिसीयां रियाल व डालर के बल पर बनाई गई थीं जिनका वास्तविक या इस्लामी दुनिया से कोई लेनादेना नही था, जिनकी समय के साथ मौत हो गई। क्योंकि ज़ुल्म व आतंक और धौंस धांधली के बल पर संस्थाओं को कभी भी ज़िंदा नही रखा जा सकता। अब तालिबान से मुहब्बत का दम भरने वाले धड़ों को इस सच्चाई को ज़रूर समझ लेना चाहिए कि दूसरों से जलन व ईर्ष्या रखने वाली संस्थाएं भी अपने ही सदस्यों की नज़र मे मरी हुई होती हैं। जहां पर संस्थाओं की पालिसीयों की मौत घटित हो जाए वहां पर उनके ताबूत उठाने से वह ज़िंदा नही हो जाया करतीं। हमे यह कभी नही भूलना चाहिए की इस्लामी उम्मत के लोगों और संस्थाओं का आधार उनकी आस्था और पालिसीयों पर टिकी है। इस्लामी संस्थाओं की ज़िन्दगी मे उनकी पालिसीयां उस क़ुतुबनुमा की तरह हैं जिससे दिशा का इल्म होता है। अगर किसी इस्लामी संस्था की दिशा निश्चित न हो और हरकत नज़र आए तो उसके चलाने वालों को चाहिए कि वह पहले अपनी सही दिशा निश्चित करें और फिर हरकत करें, अगर वह ऐसा नही करते तो जितनी हरकत करते जांएगे, उतना ही मन्ज़िल से दूर होते जांएगे। जो ताक़त संस्था की हरकत को कन्ट्रोल करती है और संस्था की पालिसीयों को सही दिशा मे बनाए रखती है, वह उसके प्रशिक्षित मिम्बर होते हैं। अगर किसी संस्था मे ट्रेनिंग का काम रुक जाए या खोखला हो जाए तो वह भंवर मे घूमने वाली उस नाव की तरह होती है, जो जितनी तेज़ी से हरकत करती है उतनी ही मौत के पास पहुंचती जाती है। किसी भी संस्था के सदस्य किस हद तक ट्रेंड हैं इसका अनुमान उनके नारों, जनसभाओं और सेमिनारों से नही हो सकता, बल्कि इसका पता उनके एकान्त व तन्हाई से चलता है। जिस संस्था के मिम्बरों की निजी ज़िंदगी उनकी पालिसीयों से ख़ाली हो, उनकी संस्थाएं भी समाप्त हो जाने वाली और खोखली होती हैं।जब किसी संस्था के झन्डे को थामने वाले लोगों के निजी जीवन मे भलाई की जगह जलन व ईर्ष्या, हिम्मत दिलाने की जगह हिम्मत तोड़ना, प्रशंसा की जगह मज़ाक़ उड़ाना, मदद की जगह पर कमी निकालना, दूर-दर्शिता की जगह क्षणिक फ़ायदा, वफ़ादारी की जगह मक्कारी और मेहनत की जगह हंसी मज़ाक़ ले ले तो इस संस्था की हरकत और काम को ज़िन्दगी का सिम्बल समझना, ख़ुद ज़िन्दगी के साथ बहुत बड़ा मज़ाक़ है। हमारी संस्थाओं को हर मोड़ पर इस सच्चाई को सामने रखना चाहिए कि पालिसीयों पर समझौते का रिज़ल्ट संस्थाओं की मौत की सूरत मे निकला करता है। संस्थाएं नारों से नही बल्कि पालिसीयों से ज़िंदा रहा करती हैं और पालिसियों की हिफ़ाज़त केवल प्रशिक्षित मिम्बर ही करते हैं। जहां पर संस्थाओं मे मिम्बरों की ट्रेनिंग का काम रुक जाए, वहां पर संस्थाओं को मरने और खोखला होने से कोई नही रोक सकता। यह सच्


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