इस्लाम के राजनीतिक दृष्टिकोणः

इस्लाम में स्वतंत्रता (1)

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हमने इस्लाम में राजनीति के महत्व को बयान करते हुए कहा था कि शासन और राजनीतिक मुद्दे, इस्लाम की मूल सिद्धांतों का एक अंश हैं। इससे पहले हमने इशारा किया था कि कुछ लोगों ने समाज में खलबली मचाने और जनता के विचारों को ख़राब करने के लिए इस्लामी शासन के बारे में बहुत से संदेह प्रचलित किये हैं जिनमें से एक संदेह यह था कि धर्म का क्षेत्रफल, सांसारिक मुद्दों से भिन्न है और उसे सांसारिक समस्याओं में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है और यह कि सांसारिक कार्यों में धर्म का हस्तक्षेप, धर्म को शोभा नहीं देता है।

1. पिछली बातों पर एक सारांशिक दृष्टिहमने इस्लाम में राजनीति के महत्व को बयान करते हुए कहा था कि शासन और राजनीतिक मुद्दे, इस्लाम की मूल सिद्धांतों का एक अंश हैं। इससे पहले हमने इशारा किया था कि कुछ लोगों ने समाज में खलबली मचाने और जनता के विचारों को ख़राब करने के लिए इस्लामी शासन के बारे में बहुत से संदेह प्रचलित किये हैं जिनमें से एक संदेह यह था कि धर्म का क्षेत्रफल, सांसारिक मुद्दों से भिन्न है और उसे सांसारिक समस्याओं में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है और यह कि सांसारिक कार्यों में धर्म का हस्तक्षेप, धर्म को शोभा नहीं देता है। धर्म केवल उन कार्यों से सम्बंधित है, जो परलोक और आंतरिक समस्याओं से सम्बंध रखते हैं। और धर्म, मनुष्य के ईश्वर से सम्बंध व सम्पर्क का नाम है। सारांश यह हुआ कि धर्म से कम से कम आशाएं रखें। इस से पहले भाषण में हमने इस संदेह का उत्तर प्रस्तुत किया था और हमने (धर्म से हमारी आशाएं) के संदर्भ में चर्चा केबारे में प्रवंचन (छल कपट) कि धर्म से हमारी आशाएं अधिक हों या कम, का उत्तर विस्तार से बयान किया था।उपर्युक्त उत्तर का सारांश यह है कि मनुष्य के जीवन और उससे सम्बन्धित दूसरी जानकारियों की दो प्रक्रियाएं हैं। पहली प्रक्रिया यह है कि इल्लत और मालूल में सम्बंध पाया जाता है जैसा कि यह सम्बंध सभी वस्तुओं में पाया जाता है, उदाहरण स्वरूप कौन सी तत्व आपस में मिश्रित हों ताकि अमुक रासायनिक वस्तु निर्मित हो सके। और एक जीवित प्राणी किन शर्तों के साथ उन्नति प्राप्त करता है। तथा यह मनुष्य जो एक जीवधारी प्राणी है, किस प्रकार जीवन व्यवतीत करता है और किस प्रकार अपने स्वास्थ की रक्षा करता है और जब बीमार हो जाता है तो किस प्रकार अपना उपचार कराता है।इस संसार की सभी वास्तविकताओं की दूसरी प्रक्रिया वह सम्बंध है जो मनुष्य की आत्मा और वास्तविक व आंतरिक कौशलता तथा मूल्यों से सम्बंधित है।2. ज्ञान और धर्म के विशेष क्षेत्रफल अथवा विशेष कार्यमद्यसार (अलकोहल) को किस तरह और किन वस्तुओं द्वारा बनाया जाता है और मद्यसार कितने प्रकार का होता है, यह एक ज्ञानात्मक चर्चा है।  ऐसी वस्तुओं के बारे में अनुसंधान करना, धर्म का कर्तव्य नहीं है। धर्म का कर्तव्य यह है कि वह बयान करे कि मद्यसार को पिया जाए या नहीं? और उसका पीना मनुष्य की आत्मा और वास्तविक व आंतरिक कोणों के लिए हानिकारक है या नहीं? दूसरे शब्दों में यह कहा जाए कि धर्म का कर्तव्य यह बयान करना है कि अलकोहल का उपयोग करना हलाल अर्थात वैध व अवर्जित है या हराम अर्थात अवैध व वर्जित। इसी तरह धर्म दूसरी वस्तुओं के भी नियमों को बयान करता है, मगर उसके ज्ञानात्मक कोणों को बयान नहीं करता, धर्म इन वस्तुओं के मध्य सम्बंध के बारे में चर्चा नहीं करता है बल्कि वह तो उन वस्तुओं की आंतरिक आत्मा से सम्बंध को बयान करता है और उन ही के बारे में अनुसंधान करता है। किस कार्यालय का प्रबंधक किस तरह सही प्रकार से काम कर सकता है और क्या कार्यक्रम बनाए जाएं ताकि अच्छे परिणाम निकल सकें? इन प्रश्नों का उत्तर तो ज्ञान, विद्या और अनुभव दे सकता है परन्तु उन कारख़ानों में क्या वस्तुएं बनाई जाएं और कौन सी वस्तु बनाना वैध है और कौन सी वस्तुओं का निर्माण अवैध व वर्जित है और कौन सी वस्तुएं मानवीय आत्मा से सम्बंध रखती है? यह बताना धर्म का काम है।3. धार्मिक सत्ता और स्वतंत्रता के बीच टकराव, मात्र एक संदेहजनता को पथभ्रष्ट करने के लिए एक संदेह जो विभिन्न शैलियों से बयान किया जाता है जबकि यह संदेह केवल एक भ्रांति है। और वह संदेह यह है कि अगर धर्म मनुष्य के राजनीतिक और सामाजिक कार्यों में हस्तक्षेप करे और जनता के किसी विशेष मार्ग को अपनाने पर बल दे या किसी के अनुकरण का आदेश दे तो यह मनुष्य की स्वतंत्रता के विरूद्ध है। मनुष्य चूँकि स्वतंत्र है और उसे अधिकार है कि जो चाहे करे, जो चाहे न करे, अतः उसको किसी काम पर मजबूर करने का किसी को कोई अधिकार नहीं है और चूँकि धर्म मनुष्य के लिए कर्तव्य व उत्तरदायित्व निर्धारित करता है और उसको किसी के अनुकरण का आदेश देता है और अनुकरण भी निरपेक्ष और असीमित अनुकरण अर्थात बिना चूँ व चरा के, यह सब स्वतंत्रता से मेल नहीं खाता।4. उपर्युक्त संदेह का वर्णन धार्मिक शैली से हुआ हैउपर्युक्त संदेह को विभिन्न रूपों में बयान किया जाता है उनमें से एक रूप यह है कि संदेह करने वाला अपनी धर्मनिष्ठता (दीनदारी) का डंका बजाता है और स्वंय को क़ुरआन का मानने वाला कहता है और अपने विचारों को आस्तिक और धर्मनिष्ठ लोगों पर प्रभावकारी करने के लिए उसको क़ुरआनी और धार्मिक बातों से सुसज्जित करता है और कहता है कि इस्लाम, मनुष्य की स्वतंत्रता का बहुत सम्मान करता है और कुरआने करीम दूसरों के आधिपत्य और शासन को मना करता है यहां तक कि स्वंय पैग़म्बरे इस्लाम किसी पर शासन का अधिकार नहीं रखते थे और किसी को मजबूर नहीं करते थे, अतः क़ुरआन के दृष्टिकोण के अनुसार, मनुष्य स्वतंत्र है और किसी के अनुकरण पर मजबूर नहीं है।इन सभी संदेहों के प्रचलित करने का लक्ष्य धर्मशास्त्री के सर्वोच्च अधिकार व नेतृत्व (विलायते फ़क़ीह) के सिद्धांतों को कमज़ोर करना है, इसी लक्ष्य तक पहुंचने के लिए यह संदेह उत्पन्न किया गया है ताकि विलायते फ़क़ीह के अनुकरण को मनुष्य की स्वतंत्रता के विरूद्ध बताया जा सके और यह इस्लामी दृष्टिकोण के पूर्णतः विरूद्ध है, क्यों कि मनुष्य सर्वश्रेष्ठ प्राणी है और धरती पर ईश्वर का प्रतिनिधि है। नीचे उन आयात को प्रस्तु किया जाएगा जिनको संदेह करने वालों ने अपना प्रमाण बनाया है। ईश्वर, इस्लामी ईशदूत माननीय हज़रत रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिही वसल्लम को सम्बोधित करते हुए कहता हैः1. तुम तो बस उपदेश करने वाले हो तुम उनके नियंत्रक तो हो नहीं कि उन्हें बाध्य करो। इस आयत के दृष्टिगत, इस्लामी ईशदूत माननीय हज़रत रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिही वसल्लम, का स्थान सबसे उत्तम व श्रेष्ठ हैं मगर वह भी शासन का अधिकार नहीं रखते हैं, मुसलमान स्वतंत्र हैं और उन पर पैग़म्बरे इस्लाम का अनुकरण करना अनिवार्य नहीं है और पैग़म्बरे इस्लाम को जनता के जीवन के बारे में विचार अभिव्यक्त का अधिकार बिल्कुल नहीं है।2. और हमने तुमको जनता का नियंत्रक तो बनाया नहीं है और न ही तुम उनके कार्यों के उत्तरदायी हो। 3. संदेश पहुंचा देने के अतिरिक्त, रसूल का कर्तव्य कुछ और नहीं है। 4. और हमने मनुष्य को मार्ग भी दिखा दिया चाहे आभारी हो चाहे कृतघ्न। 5. तुम कह दो कि सच्ची बात ईश्वर की ओर से अवतरित हो चुकी है बस जो चाहे माने और जो चाहे न माने। उपर्युक्त संदेह का उत्तरउपर्युक्त संदेह के उत्तर में हम यह कहते हैं कि उपर्युक्त संदेह करने वाले ने जिन आयात को रसूले इस्लाम के शासक न होने और इस्लामी ईशदूत माननीय हज़रत रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिही वसल्लम, के अनुकरण के अनिवार्य न होने के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया है, उनके मुक़ाबले में दूसरी  ऐसी आयतें भी मौजूद हैं, जो स्वंय संदेह करने वाले के ग़लत विवेक के विपरीत हैं। हम उन आयतों को नीचे बयान कर रहे हैं।1. और न किसी आस्तिक व धर्मवादी पुरुष को यह लिए यह अधिकार है और न किसी आस्तिक, विश्वासी व धर्मवादी स्त्री को, कि जब ईश्वर और उस


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