क़यामत अर्थात महाप्रलय

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रहमत, अल्लाह तआला की विशेषताओं में है जिसका मतलब यह है कि अल्लाह तआला अपनी मख़लूक़ की ज़रूरतों का पूरा करने वाला है और उनमें से हर एक को कमाल व कौशल की तरफ़ रहनुमाई करके उसके मुनासिब स्थान तक पहुँचाता है। इंसानी ज़िन्दगी की विशेषताएं साफ़ तौर पर इंसान की अनन्त ज़िन्दगी को बयान करती हैं इसलिए एक ऐसी जगह होना ज़रूरी है कि जहाँ इंसान अनन्त ज़िन्दगी बिता सके।..........

क़यामत, अल्लाह तआला की रहमत (कृपा), हिकमत (नीति) और उसकी अदालत के लागू होने का स्थान है इस बारे में क़ुर्आने मजीद में यह इरशाद हैः{کَتَبَ عَلَی نَفْسِہِ الرَّحْمَۃَ لَیَجْمَعَنَّکُمْ إِلَی یَوْمِ الْقِیَامَۃِ لاَرَیْبَ فِیہِ }उसने अपने ऊपर रहमत को लिख लिया है निश्चित रूप से वह तुम्हें क़यामत के दिन एक जगह जमा करेगा, जिसमें कोई शक व संदेह नहीं है।रहमत, अल्लाह तआला की विशेषताओं में है जिसका मतलब यह है कि अल्लाह तआला अपनी मख़लूक़ की ज़रूरतों का पूरा करने वाला है और उनमें से हर एक को कमाल व कौशल की तरफ़ रहनुमाई करके उसके मुनासिब स्थान तक पहुँचाता है। इंसानी ज़िन्दगी की विशेषताएं साफ़ तौर पर इंसान की अनन्त ज़िन्दगी को बयान करती हैं इसलिए एक ऐसी जगह होना ज़रूरी है कि जहाँ इंसान अनन्त ज़िन्दगी बिता सके।क़यामत अल्लाह तआला की नीति व हिकमत के अनुसार भी है क्योंकि यह दुनिया, कि जो लगातार हरकत और परिवर्तन में है अगर यह उस प्वाइंट तक न पहुँचे कि जहाँ उसमें ठहराव हो तो यह दुनिया अपने आख़री मक़सद व लक्ष्य तक नहीं पहुँचेगी और अल्लाह तआला से जो कि हकीम (बिना किसी मक़सद के कोई काम अंजाम नहीं देता) है बेमक़सद काम अन्जाम पाना असम्भव है, जैसा अल्लाह तआला फ़रमाता हैः{أَفَحَسِبْتُمْ أَنَّمَا خَلَقْنَاکُمْ عَبَثًا وَأَنَّکُمْ إِلَیْنَا لاَتُرْجَعُونَ }क्या तुमने यह सोच लिया है कि हमने तुमको बेकार पैदा किया है और तुम हमारी तरफ़ पलटा कर नहीं लाए जाओगे?दूसरे स्थान पर यह बयान करने के बाद कि आसमान और ज़मीन और जो कुछ इनके बीच है अल्लाह तआला ने उन सब को बेकार पैदा नहीं किया है। क़यामत का उल्लेख करने के बाद यह इरशाद फ़रमाता हैः{ إِنَّ یَوْمَ الْفَصْلِ مِیقَاتُہُمْ أَجْمَعِینَ }क़यामत का एक और फ़लसफ़ा यह है कि अच्छे और बुरे तथा मोमिन और काफ़िर के बारे में अल्लाह का न्याय पूरी तरह से लागू हो जाए क्योंकि दुनिया में सारे इंसानों के एक साथ ज़िन्दगी बिताने के कारण अल्लाह तआला के न्याय के अनुसार इनाम व सज़ा के क़ानून को पूरी तरह से लागू करना असम्भव है, इस आधार पर एक ऐसी जगह का वुजूद ज़रूरी है कि जहाँ अल्लाह तआला के इनाम व सज़ा पर आधारित क़ानून के लागू करने की पूरी सम्भावना पाई जाती हो, इस बारे में क़ुरआने मजीद में इरशाद होता हैः{ أَمْ نَجْعَلُ الَّذِینَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ کَالْمُفْسِدِینَ فِی الْأَرْضِ أَمْ نَجْعَلُ الْمُتَّقِینَ کَالْفُجَّارِ}क्या हम मोमिनों और अच्छे लोगों को ज़मीन पर फ़साद (अशांति व उपद्रव) फैलाने वालों और परहेज़गारों (सदाचारियों) को फ़ाजिरों (पापियों) के बराबर क़रार देंगे?इसी तरह दूसरे स्थान पर अल्लाह तआला फ़रमाता हैः{ أَفَنَجْعَلُ الْمُسْلِمِینَ کَالْمُجْرِمِین مَا لَکُمْ کَیْفَ تَحْکُمُونَ}क्या हम झुक जाने वालों को मुजरेमों और अपराधियों के बराबर ठहराएंगे, तुम्हे क्या हो गया है, क्या फ़ैसला करते हो?मआद की हक़ीक़तक़यामत जिसे अरबी में मआद कहा जाता है और मआद का मतलब, वापस पलटना हैं और दीन की परिभाषा में क़यामत के दिन जिस्म में दोबारा रूह की वापसी को मआद कहा जाता है इस बिना पर क़यामत का सम्बंध जिस्म और रूह दोनों से है यानी क़यामत रूहानी (आत्मिक) भी है और जिस्मानी भी। आख़ेरत का इनाम व सज़ा भी दो तरह की हैं। कुछ इनाम व सज़ाएं मानसिक और आत्मिक हैं जिनके लिये जिस्म और सेंसेटिव हिस्सों की ज़रूरतनहीं है जैसे ज़ालिमों के लिये दिल हिला देने वाली हसरत, जैसा कि क़ुर्आने करीम में इरशाद होता हैः{ کَذَلِکَ یُرِیہِمُ اﷲُ أَعْمَالَہُمْ حَسَرَاتٍ عَلَیْہِمْ}और परहेज़गारों और सदाचारियों के लिये आनंद है जैसा कि इरशाद होता हैः{ وَرِضْوَانٌ مِنْ اﷲِ أَکْبَرُ}दूसरे प्रकार का इनाम या सज़ा जिस्मानी है जिसको महसूस करने के लिये जिस्म और जिस्मानी सेंस की ज़रूरत है।जिस्मानी मआद पर दलालत करने वाली आयतों के अलावा वह कुछ और आयतें भी मौजूद हैं जिनमें क़यामत के इंकार करने वालों का जवाब दिया गया है। इन आयतों के अनुसार क़यामत के इंकार करने वालों ने मर कर गल जाने या ख़ाक में मिल जाने के बाद जिस्म के दोबारा ज़िन्दा होने का इन्कार किया है या इसे अक़्ल से दूर बताया है जबकि क़ुरआने करीम नें इनके इन्कार का जवाब अल्लाह तआला के असीमित इल्म के ज़रिए दिया है। अगर जिस्मानी क़यामत ज़रूरी न होती तो उनके जवाब का सबसे आसान रास्ता इस तरह की क़यामत का इन्कार ही था न यह कि यह कहा जाता कि अल्लाह तआला का इल्म असीमित है या दूसरी बार पैदा करना पहली बार पैदा करने से ज़्यादा आसान है और इसकी दलील के तौर पर इस दुनिया से तरह तरह की मिसालें बयान करना आदि।इस तरह की आयतों व रिवायतों की किसी तरह भी तावील (व्याख्या) सम्भव नहीं है इसलिए जिन लोगों ने जिस्मानी मआद की तावील की है और वह सिर्फ़ रूहानी मआद को मानते हैं उनकी यह तावील क़ुबूल करने योग्य नहीं है। शेख़ तूसी रह. यह कहने के बाद कि जिस्मानी मआद को बयान करने वाली आयतें बहुत ज़्यादा हैं, फ़रमाते हैं किःواکثرہ مما لا یقبل التاویلइनमें अकसर आयतें ऐसी हैं जिनकी तावील मुमकिन नहीं है। इसके बाद उन्होने इस तरह की कुछ आयतें बयान की हैं। मौत के साथ दुनियावी ज़िन्दगी ख़त्म हो जाती है और इंसान बरज़ख़ के मरहले में दाख़िल हो जाता है और आख़िर कार उसे क़यामत के मरहले में क़दम रखना है जहाँ वह अपने किए हुए कामों का इनाम या सज़ा पाएगा। इस तरह इंसान के लिये तीन तरह की ज़िन्दगी मुक़द्दर की गयी है।1. दुनियावी ज़िन्दगी2. बरज़ख़ी ज़िन्दगी3. आख़ेरत की ज़िन्दगीइंसान की दुनियावी ज़िन्दगी के भी कई चरण हैं। दुनियावी ज़िन्दगी का सबसे महत्वपूर्ण मरहला तब शुरू होता है जब इंसान बालिग़ हो जाता है और इसी मरहले से उसकी आख़ेरत की ज़िन्दगी रिलेटेड होती है और उसकी बुनियाद पर यह फ़ैसला होता है कि यह इंसान नेक होगा या फ़ासिक़ व फ़ाजिर (भ्रष्ट व पापी), जन्नती होगा या जहन्नमी।क़ब्र व बरज़ख़मौत के साथ ही इंसान की बरज़ख़ी ज़िन्दगी शुरू हो जाती है, मौत से क़यामत के बीच की दूरी को बरज़ख़ कहा जाता है। जैसा कि क़ुर्आने करीम में भी इरशाद हुआ हैःوَمِنْ وَرَائِہِمْ بَرْزَخٌ إِلَی یَوْمِ یُبْعَثُونबरज़ख़ की दुनिया में प्रवेश करने के बाद सबसे पहले स्टेज में वह सवाल हैं जो तौहीद व नुबूव्वत या दूसरे अक़ीदों के बारे में फ़रिश्ते मरने वाले से पूछते हैं इन सवालों के जो जवाब दिये जाते हैं उनका सम्बंध आम तौर पर इंसान की दुनियावी ज़िन्दगी के ईमान व अक़ीदों से होता है, यह स्टेज जिसे क़ब्र के सवाल कहा जाता है, शियों के निश्चित विश्वासों में शामिल है जैसा कि शेख़ सदूक़ रह. ने अपनी एतेक़ाद से सम्बंधित किताब में लिखा है। क़ब्र में सवाल व जवाब के बारे में हमारा विश्वास यह है कि यह हक़ है और जो शख़्स इन सवालों के सही जवाब देगा, अल्लाह तआला की रहमत उसे नसीब होगी और जो इंसान ग़लत जवाब देगा उसे सज़ा मिलेगी।शेख़ मुफ़ीद रह. ने क़ब्र में सवाल के मसले को लिखने के बाद यह याद दिलाते हैं कि क़ब्र में सवाल होना इस बात का प्रमाण है मुर्दे क़ब्र में ज़िन्दा होते हैं और उनकी यह ज़िन्दगी क़यामत तक जारी रहती है।कुछ इंसानों से मख़सूस क़ब्र के अज़ाब के बारे में शेख तूसी रह. लिखते हैः क़ब्र के अज़ाब का होना निश्चित है क्योंकि यह एक सम्भव चीज़ है और इसके बारे में बहुत सी रिवायतें मौजूद हैं।रिवायतों में क़ब्र को जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ या जहन्नम की घाटियों में से एक घाटी कहा गया है।القبر روضۃ من ریاض الجنۃ او حفرۃ من حفر النیرक़ब्र जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ या जहन्नम के गड्ढों में से एक गड्ढा है।इस तरह की रिवायतों में क़ब्र का मतलब वह क़ब


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सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह ख़ामेनई का हज संदेश
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