इस्लाम के राजनीतिक दृष्टिकोण

धार्मिक दृष्टि से राजनीति का महत्व (2)

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इस्लामी गणतंत्र ईरान की एरोनैटिक संस्था के प्रमुख मनू चेहेर मुत्तकी ने कहा है कि ईरानी विशेषज्ञ आधुनिक ड्रोन विमान बना रहे हैं..........

1). पिछली बातों पर एक सारांशिक दृष्टि पिछले भाषणों में बयान किया जा चुका है कि ईरान में इस्लामी क्रान्ति की सफलता और इस्लामी शासन की स्थापना के बाद इस्लामी शत्रु शक्तियाँ अपने पूरे प्रयत्न व प्रयास और विश्लेक्षण के तत्पश्चात इस परिणाम पर पहुँचीं कि इस इस्लामी क्रान्ति से मुक़ाबले के लिए क्रान्ति की मौलिक और केंद्रीय चीज़ों का अध्ययन किया जाए (जो वली-ए-फ़क़ीह के स्वामित्व पर आधारित है) और उसको अपने प्रोपगेंडे की तेज़ धार का निशाना बनाया जाए इसलिए आज हम देख रहे हैं कि पिछले कुछ सालों से आज तक इस्लामी शासन और फ़क़ीह के स्वामित्व पर संसार भर में विभिन्न प्रकार के विरोध होते रहते हैं और इस तरह शत्रु शक्तियों के प्रतिनिधान देश में वली-ए-फ़क़ीह के विरूद्ध पूरे प्रयास के साथ व्यस्त हैं। इन सभी बातों के बावजूद यद्धपि हमारी जनता और राष्ट्र धर्मशास्त्री के सर्वोच्च अधिकार एंव नेतृत्व (वली-ए-फ़क़ीह) के शासन पर पूरा विश्वास रखती है और इस शासन का हर तरह से समर्थन करती है परन्तु फिर भी आवश्यक है कि उल्लिखित समस्याओं के समाधान के बारे में विस्तार पूर्वक चर्चा की जाए ताकि इस शासन के सैद्धांतिक और बौद्धिक तत्व, जनता और विशेष रूप से जवान वंश के लिए स्पष्ट और रौशन हो जाएं।जैसा कि हमने बयान किया कि इस सिलसिले में तीन प्रकार के संदेह किये जाते है। पहला संदेह यह है कि धर्म का राजनीति से कोई सम्बंध नहीं है और राजनीतिक व्यवस्था किसी भी स्थिति में धार्मिक नहीं हो सकती। पिछले भाषण में हमने इस संदेह का उत्तर दिया कि अगर कोई आदमी चाहता है कि वह यह देखे कि इस्लाम एक धर्म होने के हिसाब से राजनीति से आश्रित है या नहीं? तो इस के उत्तर के लिए कुरआने मजीद और उसमें बयान किये गए नियमों व क़ानूनों का एक सारांशिक अध्ययन काफ़ी है और जो आदमी वास्तव में मुसलमान है और कुरआने मजीद पर विश्वास रखता है और इसी तरह वह आदमी जो मुसलमान नहीं है परन्तु इस्लाम की शिनाख़्त और उसके बारे में ज्ञान प्राप्त करना चाहता है तो उसको कुरआने मजीद की से सम्पर्क स्थापित करना चाहिए तब उस पर यह वास्तविकता स्पष्ट हो जाएगी कि धर्म और राजनीति का एक दूसरे से अलग होना  असंभव है।यह बात भी स्पष्ट है कि इस्लाम की पहचान का सही तरीक़ा कुरआने मजीद है। जैसे अगर हम चाहें कि किसी एक विषय के बारे में ईसाईयों का दृष्टिकोण मालूम करें तो इसके लिए हमें बाईबिल का अध्ययन करना पड़ेगा। यद्धपि हमने जो कुछ बयान किया वह उन लोगों के लिए है जो समस्याओं को समाधान करने के लिए सही और तार्किक व तर्क पूर्ण मार्ग अपनाए चाहते हैं। चाहे चर्चा हो, वार्तालाप हो या अध्ययन और अनुसंधान हो, सही मार्ग का चयन करें। परन्तु शत्रु चर्चा और वार्तालाप के लिए सही और तार्किक तरीक़ों से दूर भागता है क्यों कि उसका लक्ष्य केवल आस्तिक जनता में शंका और संदेह पैदा करना है ताकि उनके विश्वास को शिथिल कर दे और चूँकि उनकी चर्चा तार्किक नहीं होती कि हम उसका उत्तर दें। परन्तु फिर भी हम अपना कर्तव्य समझते हैं कि उनके संदेहों का तार्किक उत्तर दें।2). क्या धर्म राजनीति से अलग है? धर्म निरपेक्ष लोगों के दृष्टिकोणजिन लोगों ने धर्म के राजनीति और शासन से अलग होने में धर्म निरपेक्ष दृष्टिकोणों को चयन किया है, वह लोग कहते है कि हमको क़ुरआन से कोई मतलब नहीं है। हम धर्म निरपेक्ष दृष्टिकोण से देखते हैं। इस से पहले कि हम इस्लामी स्रोतों का अनुसंधान करें या यह देखें कि क़ुरआन राजनीति के सम्बंध में क्या कहता है यह प्रश्न करेंगे कि मनुष्य को धर्म की क्या आवश्यकता है? और किन समस्याओं में उसको धर्म के मार्ग दर्शन की आवश्यकता है? उन्होंने इस मुद्दे के बारे में दो दृष्टिकोण प्रस्तुत किए हैःपहला दृष्टिकोण यह है कि मनुष्य सभी चीज़ों और जीवन के सभी कामों में धर्म की आवश्यकता रखता है जैसे खाना किस तरीक़े से तय्यार किया जाए और किस तरीक़े से खाया जाए या मकान किस तरह बनाया जाए, शादी ब्याह के तरीक़े क्या हैं? उन्होंने शासन व समाज के निर्माण को एक ही वर्णक्रम में रखा है और वह इस तरह कहते हैं कि क्या धर्म के लिए आवश्यक है कि इन सभी समस्याओं का समाधान करे? और मनुष्य ज्ञानात्मक और सूक्ष्म समस्याओं के समाधान का प्रयास न करे? हमको अक्सर समस्याओं के समाधान में धर्म के उत्तर का प्रतीक्षक नहीं बना रहना चाहिए कि धर्म ही से हर समस्या का विवरण तलब करें। इसका अर्थ यह है कि अगर हम कोई लिबास बनाना चाहें तो पहले यह मालूम करे कि इस्लाम का दृष्टिकोण क्या है और अगर भोजन खाना चाहें तो देखे कि इस्लाम ने किन खानों की अनुमति दी है और अगर बीमार हो जाएं और डाक्टर के पास जाना पड़े तो देखे कि इस्लाम ने इस बारे में क्या उपदेश दिए हैं? इसी तरह इस्लाम ने शासन और राजनीति के बारे में क्या दृष्टिकोण प्रस्तुत किये हैं?दूसरा दृष्टिकोण यह है कि धर्म केवल कुछ चीज़ों में हस्तक्षेप का अधिकार रखता है और हमें धर्म से न्यूनतम आशाएं रखनी चाहिएं और यह बात स्वाभाविक है कि धर्म हर एतेबार से मनुष्य की आवश्यकताओं पर निगाह नहीं रखता है बल्कि कोई भी धर्म यह दावा नहीं कर सकता कि वह मनुष्य की सभी आवश्यकताओं को पूरा कर सकता है।जब हमने यह देख लिया कि धर्म हमको खाना पकाना, एलाज करना, हवाई जहाज़ और कश्ती बनाना आदि नहीं सिखाता है तो अब हमको यह देखना होगा कि उन समस्याओं में जिन को धर्म ने बयान किया है बाक़ी दूसरी समस्याओं में क्या अंतर है और यह भी जानना पड़ेगा कि धर्म ने किस किस क्षेत्र में क़दम रखा है।वह लोग अपने विचार में इस परिणाम पर पहुँचे हैं कि एक दूसरे प्रकार को चयन करें और वह यह कि धर्म केवल धार्मिक कामों में है और वह लौकिक व सांसारिक समस्याओं से कोई सम्बंध नहीं रखता। हमें धर्म से कम से कम आशा रखनी चाहिए और धर्म के द्वारा केवल उन चीज़ों और तरीक़ों को पहचानना चाहिए जिन के द्वारा परलोक में सफलता मिल सके, स्वर्ग में जा सकें और नर्क से मुक्ति प्राप्त कर सकें। जैसे नमाज़ पढ़ना, रोज़ा रखना, हज को अन्जाम देना और दूसरे इबादतों से सम्बंधित समस्याओं का धर्म द्वारा समाधान करना चाहिए।उन लोगों ने अपने विचार में धर्म व राजनीति के सम्बंध के बारे में यह समझ लिया है कि धर्म राजनीति से अलग है। उनका कहना है कि राजनीति का धर्म से कोई सम्बंध नहीं हैं राजनीति का क्षेत्रफल लौकिक व सांसारिक कामों तक ही सीमित है और धर्म का क्षेत्रफल परलोक से सम्बंधित है न धर्म को राजनीति में हस्तक्षेप करना चाहिए और न ही राजनीति को धर्म में हस्तक्षेप का अधिकार है।चूँकि राजनीति का सम्बंध संसार और विद्या से है अतः राजनीति को केवल विद्या और मानवीय आविष्कारों में ही सीमित रहना चाहिए चाहे भौतिक विज्ञान हो या रसायन शास्त्र, समाज विज्ञान हो या दूसरे विषय हो उनमें धर्म हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं रखता है और धार्मिक अधिकारों का क्षेत्रफल केवल परलोक की आवश्यकताओं में ही सीमित है।इस समस्या का इतिहास कुछ शताब्दी पहले पश्चिमी देशों की ओर पलटता है। जिस समय ईसाई पादरियों, धर्मविधिज्ञों और राजनीतिक लोगों के मध्य विरोध और टकराव पैदा हुआ और उनके बीच वर्षों इसी बारे में वाद विवाद  एंव असमंजस बना रहा और अंत में उनका वाद विवाद बिना किसी लिखित संधिपत्र के समाप्त हो गया जिसमें यह तय पाया की धर्म केवल परलोक से सम्बंधित कार्यों में और मनुष्य के ईश्वर से सम्बंध के बारे में हस्तक्षेप


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सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह ख़ामेनई का हज संदेश
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