इस्लाम के राजनीतिक दृष्टिकोणों पर चर्चा की आवश्यकता 2

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यहां पर एक और महत्वपूर्ण विषय भी है कि जिस पर स्थायी रूप से और अलग तरीक़े से चर्चा हो सकती है, परन्तु इस समय केवल उसकी ओर इशारा करेंगे।..........

6. धर्म की परिभाषा और उसका क्षेत्रफलयहां पर एक और महत्वपूर्ण विषय भी है कि जिस पर स्थायी रूप से और अलग तरीक़े से चर्चा हो सकती है, परन्तु इस समय केवल उसकी ओर इशारा करेंगे।यहां पर चर्चा यह है कि धर्म की सीमाएं कहाँ तक हैं और जिस समय हम चर्चा करते हैं कि शासन और धर्म में क्या सम्बंध है और धर्म का राजनीति से अलग करना सही है या नहीं? तो सबसे पहले धर्म को पहचानना आवश्यक है कि धर्म क्या है धर्म की सही तरीक़े से परिभाषा होनी चाहिए ताकि इसी आधार पर उसकी सीमाएं भी निर्धारित की जा सकें। इस बारे में कुछ लोगों ने धर्म की आवश्यकता पर अनुसंधान किये हैं और वास्तविक व आंतरिक जीवन में धर्म की सीमाओं को पहचानने का प्रयास किया हैं इसके बाद यह चर्चा प्रारम्भ की है कि इस्लाम में राजनीति धर्म का अँश है या नहीं? और इसी तरह इस बारे में बहुत सी चर्चाएं हुई हैं जिनसे आप श्रोता भी अवगत हैं। उदाहरण स्वरूप क्या धर्म मनुष्य के जीवन में हस्तक्षेप का अधिकार रखता है, या यह कि मनुष्य के जीवन के कुछ हिस्से में हस्तक्षेप का अधिकार रखता है इस अवस्था में वास्तविक व आंतरिक जीवन की अधिकांश समस्याओं को बुद्धि और जनता की इच्छाओं के अनुसार होना चाहिए। जो लोग धर्म को शासन से अलग मानते हैं जिस समय वह धर्म की परिभाषा करते हैं, सेक्युलारिज़्म अर्थात धर्मनिरपेक्षता के दृष्टिकोणों का समर्थन करते हुए कहते हैं कि धर्म अर्थात मनुष्य का ईश्वर से आत्मीय लगाव या इस से एक क़दम और आगे बढ़ कर कहते हैं कि धर्म वह चीज़ है जो परलोक (अगर परलोक को स्वीकार करें) के जीवन में संभवतः प्रभावकारी और कारगर होता है। धर्म का काम यह है कि मनुष्य के जीवन को परलोक के अनुरूप ढ़ालें और बस।और यह बात स्पष्ट है कि अगर इस तरह धर्म की परिभाषा की जाए तो फिर यह कहना बहुत सरल है कि धर्म का राजनीति से क्या सम्बंध? राजनीति का ईश्वर से आंतरिक सम्बंध में क्या दख़्ल? राजनीति केवल मनुष्यों के मध्य एक दूसरे के सम्बंध व सम्पर्क को बयान करती है और राजनीति धर्म से अलग है चूँकि राजनीति मनुष्य के सांसारिक जीवन से सम्बंध रखती है और इसका परलोक से कोई सम्बंध नहीं हैं अगर धर्म की सीमाएं केवल यही हों कि जिसे मनुष्य की बुद्धि न समझ सके और जहां बुद्धि स्वंय निर्णय न ले सकती हो, तो फिर राजनीति का धर्म से कोई सम्बंध नही होगा क्यों कि धर्म की सीमाएं वहीं तक सीमित हैं कि जहां तक बुद्धि की पहुँच न हो।अतः हमने धर्म की परिभाषा बयान करते समय उसकी सीमाओं को सीमित कर दिया और इसी प्रकार धार्मिक समस्याओं को केवल आंतरिक बुद्धि तक सीमित कर दिया चूँकि जिन समस्याओं का समाधान हमारी बुद्धि कर सकती है उनमें धर्म की कोई आवश्यकता नहीं है और हमको धर्म की आवश्यकता केवल वहाँ पर है जहां हमारी बुद्धि समस्याओं को समझने और उनका समाधान करने में असमर्थ हो और जैसे जैसे समय गुज़रता जा रहा है और मनुष्य उन्नति व विकास कर रहा है, धर्म की आवश्यकता कम होती जा रही है चूँकि इस आधार पर धर्म की आवश्यकता वहाँ है, जहां बुद्धि उन समस्याओं का समाधान करने में असमर्थ हो चूँकि आरम्भ में मनुष्य विद्या, ज्ञान और सभ्यता से अवगत नही था इसलिए मनुष्य को धर्म की आवश्यकता अधिक थी चूँकि मनुष्य स्वंय अपनी बुद्धि से समस्याओं का समाधान नहीं कर सकता था, इसलिए उसको धर्म की आवश्यकता थी।परन्तु धीरे धीरे यह आवश्यकता समय की उन्नति व विकास के कारण कम होती गई और अब आख़िरी समय में मनुष्य को धर्म की आवश्यकता लगभग नहीं के बराबर है, हाँ उन छोटे और आंशिक समस्याओं में कि जिन्हें मनुष्य की बुद्धि अभी समझने में असमर्थ है और कोई आशा भी नहीं है कि उनको जल्दी ही हल कर दिया जाएगा, उन समस्याओं में अभी भी धर्म की आवश्यकता हैं और अफ़सोस के साथ यह कहना पड़ता है कि जो लोग मुसलमान होने का दावा करते है और इस प्रकार की आपत्ति जताते हैं कि चूँकि मनुष्य की बुद्धि संपूर्ण हो चुकी है और अब धर्म और ईश्वरीय प्रेरणा के नियमों की आवश्यकता नहीं है, इसलिए इन दृष्टिकोणों के अनुसार परिणाम यह निकलेगा कि राजनीति का धर्म से कोई सम्बंध नहीं हैं जब हम यथोचित प्रयास और बौद्धिक तर्कों द्वारा समस्याओं का समाधान कर सकते हैं, तो फिर धर्म की क्या आवश्यकता?अब तक हमने जो बयान किया वह इस बारे में प्रचलित संदेह थे और हम इसका सारांशिक उत्तर आरम्भ ही में बयान कर चुके हैं कि धर्म की जो परिभाषा की गई है उसके आधार पर धर्म को केवल परलोक के जीवन से सम्बंधित और ईश्वर से वास्तविक व आंतरिक सम्बंध के समानार्थ माना गया हैं। यह दृष्टिकोण हमारी दृष्टि में असत्य और बिना किसी आधार के हैं इसी तरह यह दृष्टिकोण भी असत्य है कि राजनीतिक समस्याओं का ईश्वर से कोई सम्बंध नहीं हैं। धर्म अर्थात मनुष्य के व्यवहार का सही मार्ग जो ईश्वर चाहता हैं अगर मनुष्य अपने विश्वास में और व्यक्तिगत व सामाजिक कामों में ईश्वर की इच्छा के अनुसार क़दम उठाए तो उसे धर्मनिष्ठ कहा जाएगा और इसके मुक़ाबले में अगर मनुष्य का विश्वास ईश्वर की इच्छा के विरूद्ध हो और वह उन चीज़ों पर विश्वास रखे जो ईश्वर को पसंद नहीं हैं और उसके व्यक्तिगत व सामाजिक कार्य ईश्वर की इच्छा के विपरीत हों या उसके विश्वास में कोई अभाव हो तो उसका धर्म भी अपूर्ण होगा। अतः धर्म समस्त उल्लिखित चीज़ों को सम्मिलित है।7.धार्मिक स्रोतों से धर्म को पहचानने की आवश्यकताअगर हम धर्म की परिभाषा बयान करना चाहें तो हमें धर्मनिष्ठ और धर्म के बारे में अधिक जानकारी रखने वाले बड़े धर्मविधिज्ञों की परिभाषाओं को देखना होगा कि उन श्रीमानों ने धर्म की क्या परिभाषा की है और किस तरह धर्म से जनता को अवगत कराया है अगर हम अपनी ओर से धर्म की परिभाषा करें और उस मनगढ़त परिभाषा के आधार पर कहें कि राजनीतिक और सामाजिक समस्याएं धर्म से ख़ारिज हैं और राजनीतिक व सामाजिक समस्याओं का धर्म से कोई सम्बंध नहीं हैं जैसा कि हमने धर्म की परिभाषा की हैं अगर हम उस धर्म को समझना चाहें जो ईश्वर ने भेजा है, तो हमारे लिए आवश्यक है कि ईश्वर के धर्म के विभावन व शिनाख़्त और उसको समझने के लिए स्वंय अपने तरीक़े और अपनी सोच के अनुसार धर्म की परिभाषा न करें बल्कि धर्म की शिनाख़्त के लिए आवश्यक है कि हम ईशदूतों की चौखट पर उपस्थित हों ताकि धार्मिक किताबों द्वारा धर्म के बारे में सही जानकारी प्राप्त कर सकें।हो सकता है कि कोई यह कहे कि मैं धर्म को नहीं मानता, क्योंकि इस्लाम के सही होने पर जो तर्क प्रस्तुत किये गए हैं वह ठोस नहीं हैं। या (ईश्वर क्षमा करे) यह कहे कि हमारे पास इस्लाम के ढ़ोंग और बेकार होने के पर्याप्त सबूत मौजूद हैं अगर कोई ऐसा दावा करे तो यह चर्चा का स्थान है परन्तु अगर कोई इस्लाम को स्वीकार करने के बाद यह बात कहे तो ग़लत और बुद्धि के ख़िलाफ़ हैं या उदाहरण स्वरूप वह कहे कि जो मैं कहता हूँ वही धर्म है न  वह जो कुरआने मजीद, पैग़म्बरे इस्लाम (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिही वसल्लम) और अइम्मा (अलैहिमुस्सलाम) कहते हैं और जिस पर मुसलमान विश्वास रखते हैं। अगर कोई इस्लाम के सत्य या असत्य होने के बारे में चर्चा करे, चाहे वह उसका समर्थन करे या उसे अस्वीकार करे, उसके लिए अनिवार्य है कि पहले वह इस्लाम को पहचाने और सही इस्लाम की पहचान के लिए ईश्वर का सहारा ले कि जिसने इस्लाम को भेजा हैं और कुरआने मजीद द्वारा इस्लाम को पहचाना जाए, न यह कि अपनी इच्छा या किसी अमरीकी और यूरोपीय (कि जिनकी बातें हमारे निकट एतेबार नहीं रखती हैं) के कहने के अनुसार धर


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