इस्लाम और उसके राजनीतिक दृष्टिकोण

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जब हम यह चर्चा करते है कि इस्लाम, राजनीति और शासन के बारे में एक विशेष दृष्टिकोण रखता है जो विशेष सिद्धांतों और नियमों पर निर्भर है तो सबसे पहले यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि क्या धर्म को राजनीति और शासन के बारे में कोई विशेष दृष्टिकोण रखना चाहिए .........

जब हम यह चर्चा करते है कि इस्लाम, राजनीति और शासन के बारे में एक विशेष दृष्टिकोण रखता है जो विशेष सिद्धांतों और नियमों पर निर्भर है तो सबसे पहले यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि क्या धर्म को राजनीति और शासन के बारे में कोई विशेष दृष्टिकोण रखना चाहिए अर्थात धर्म को राजनीति और शासन में हस्तक्षेप करने का अधिकार है या नहीं कि इस्लाम के राजनीतिक दृष्टिकोणों को प्रस्तुत किया जाए यह वह महत्वपूर्ण और प्रचलित प्रश्न है जो सैकड़ों वर्षों से बहुत से देशों और समाजों में होता चला आया है विशेष रूप से संविधानक क्रांति के समय से आज तक इस प्रश्न पर काफ़ी बल दिया गया है और इस बारे में अनेक शैलियों से चर्चा भी की गई है यद्धपि इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह के वक्तव्यों के दृष्टिगत और स्वर्गीय मुदररिस रहमतुल्लाह अलैह का प्रसिद्ध वाक्य (जो हमारा धर्म है वही हमारी राजनीति है और जो हमारी राजनीति है वही हमारा धर्म है) अमिट चिन्ह के समान हमारे मस्तिष्क में समाया हुआ है अतः यह मुद्दा ईरानी राष्ट्र के लिए बिल्कुल स्पष्ट हो गया है और यह राष्ट्र इस संदर्भ में अपने लिए स्पष्ट उत्तर रखता है परन्तु इस्लाम के राजनीतिक दृष्टिकोण और धर्म की राजनीति में हस्तक्षेप करने जैसी समस्याओं पर अनुसंधान एंव अन्वेषण की आवश्यकता है।पश्चिमी सभ्यता में धर्म पूर्ण रूप से नही पहचाना गया है और धर्म को इस प्रकार से पहचनवाया गया है कि धर्म का राजनीतिक और सामाजिक समस्याओं से किसी प्रकार का कोई सम्बंध नहीं है बल्कि धर्म केवल मनुष्य के ईश्वर से सम्बंध के नाम से जाना जाता है और राजनीतिक, सामाजिक और शासनिक अर्थात लोगों के मध्य अंतरराष्ट्रीय सम्बंध व सम्पर्क, धर्म की सीमा से बाहर हैं परन्तु इस्लाम के दृष्टिकोणों के अनुसार धर्म राजनीतिक और सामाजिक समस्याओं से अलग नही है और धर्म को मनुष्य के ईश्वर से सम्बंध केअतिरिक्त राजनीतिक, सामाजिक और शासनिक अर्थात लोगों के मध्य अंतर-राष्ट्रीय सम्बंध व सम्पर्क में भी हस्तक्षेप करने का अधिकार है चूँकि इस्लाम के दृष्टिकोणों के अनुसार ईश्वर इस समस्त संसार पर स्वामी है अतः इस आधार पर राजनीतिक आर्थिक, शैक्षणिक, प्रशिक्षणिक, संचालनीय और वह दूसरी समस्याएं जो मनुष्य के जीवन से जुड़ी हुई हैं, धर्म के क्षेत्रफल से बाहर नही हैं।3. इस्लाम में राजनीतिक दृष्टिकोणों का मौलिक होनाजब कि हमने स्वीकार कर लिया कि इस्लाम शासन और राजनीति के बारे में अपना विशेष दृष्टिकोण रखता है तो अब शासन और राजनीति के बारे में इस्लाम की ओर एक विशेष दृष्टिकोण की निस्बत दी जा सकती है यद्धपि इस दृष्टिकोण के मूलतत्वों के बारे में कुछ प्रश्न उत्पन्न होते हैं।1. क्या इस्लाम का यह राजनीतिक दृष्टिकोण, एक मौलिक दृष्टिकोण है या किसी दृष्टिकोण का अनुगामी है अर्थात क्या इस्लाम ने यह दृष्टिकोण स्वंय प्रस्तुत किया हैं और ईश्वर द्वारा अवतीर्ण नियमों की तरह यह दृष्टिकोण भी ईश्वर की ओर से प्रस्तुत किया है या यह कि इस्लाम ने किसी दृष्टिकोण का अनुकरण करते हुए उसे प्रस्तुत किया है?2. इस प्रश्न के स्पष्टीकरण में हम यह कहेंगे कि इस्लाम ने बहुत सी समस्याओं के समाधान में बुद्धिमानों के चरित्र के अनुकरण का समर्थन किया है और बुद्धिमानों के चरित्र और आचरण पर बल देते हुए बुद्धिमानों के कार्यों का भी समर्थन किया है उदाहरण स्वरूप आम लोग जिस तरह के सौदे करते हैं जैसे ख़रीदना, बेचना, किराया और बीमा आदि, इन सब को बौद्धिक आचरण के नाम से याद किया जाता है कि लोगों ने जिसका आविष्कार किया है और धार्मिक विधान  व धर्मशास्त्र ने उसका समर्थन किया है।अब प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि शासन और राजनीति के बारे में इस्लाम का दृष्टिकोण क्या इसी प्रकार है कि बुद्धिमानों ने शासन और राजनीति के बारे में कुछ दृष्टिकोणों का आविष्कार किया है और धार्मिक विधान  व धर्मशास्त्र ने भी उन्हीं दृष्टिकोणों की पुष्टि की है और उन्ही को स्वीकार किया है या यह कि स्वंय इस्लाम ने इस बारे में अपना एक विशेष दृष्टिकोण आविष्कार किया है और संसार के सभी दृष्टिकोणों के मुक़ाबले में अपना एक नया दृष्टिकोण इस्लामी शासन के बारे में प्रस्तुत किया है?वास्तविकता यह है कि इस्लाम ने शासन और राजनीति के बारे में राजनीतिक और सामाजिक जीवन के लिए मौलिक और नवीन सिद्धांतों पर आधारित एक सैद्धांतिक संग्रह प्रस्तुत किया है और ऐसा नहीं है कि इस्लाम के दृष्टिकोण दूसरों के अनुकरण का परिणाम हों।जो लोग शासन के विभिन्न रूपों और राजनीति की कूट-नीतियों से अवगत हैं, वह जानते हैं कि इस बारे में विभिन्न दृष्टिकोण मौजूद है जिनमें से एक दृष्टिकोण ईश्वरीय शासन का भी है एक युग में यह दृष्टिकोण यूरोप में ईसाइयों की ओर से प्रस्तुत किया गया था और ईसाइयों में विशेष रूप से कैथोलिकों का कहना था कि हम लोग ईश्वर की ओर से लोगों पर शासन करते हैं इस के मुक़ाबले में ईसाइयों का दूसरा गुट यह कहता था कि माननीय श्री ईसा मसीह का धर्म राजनीति से अलग है मानो वह लोग धर्म को राजनीति से अलग जानते थे परन्तु कैथोलिक गुट का दृष्टिकोण यही था कि धर्म शासन और राजनीति में हस्तक्षेप करने का अधिकार रखता है और उनका विश्वास यह था कि पाप अर्थात ईसाई धर्मगुरू को शासन का अधिकार है और ईश्वर की ओर से गिरजाघर को इतनी शक्ति वाला होना चाहिए कि लोगों पर ईश्वर की ओर से शासन कर सके और लोगों को भी ईश्वर के आदेश से पाप (ईसाइयों का सबसे बड़ा पादरी) का अनुसरण करना चाहिए। इस दृष्टिकोण को धर्मतंत्र अर्थात ईश्वरीय शासन के नाम से याद किया गया है।अब जब यह कहा जाता है कि इस्लाम ने लोगों द्वारा आविष्कार किये गए शासनिक सिद्धांतों के अतिरिक्त इस्लामी शासन के लिए अपने विशेष दृष्टिकोण प्रस्तुत किये हैं तो क्या इससे यही धर्मतंत्र अर्थात ईश्वरीय शासन समझा जाए जो यूरोप में बयान होता है और क्या ईश्वरीय शासन उनकी सभ्यता में इसी रूप में पहचाना जाता है। क्या जिस तरह कैथोलिकों के धर्मतंत्र अर्थात ईश्वरीय शासन के दृष्टिकोण कि जिसमें ईश्वर ने शासक को बड़े स्तर पर अधिकार दे दिए हैं और वह उसी के अनुसार लोगों पर शासन करता है तथा इसी प्रकार लोगों पर भी अनिवार्य है कि इस शासक की इच्छा के अनुसार चलें?क्या ईश्वरीय शासन कि जिसका हम दावा करते हैं और इस्लाम में धर्मशास्त्री के सर्वोच्च अधिकार व नेतृत्व अर्थात विलायते फ़क़ीह के दृष्टिकोण के अंतर्गत क्या वली-ए-फ़क़ीह अपनी इच्छा के अनुसार जिस प्रकार चाहे लोगों पर शासन का अधिकार रखता है और क्या उसे यह भी अधिकार है कि जिस तरह वह चाहे नियम बनाकर उसके द्वारा लोगों पर शासन करे और लोगों पर भी उसका अनुकरण अनिवार्य हो?यह प्रश्न बहुत महत्वपूर्ण और आवश्यक है, इस बारे में एक उचित चर्चा विस्तार से की जानी चाहिए ताकि इस बारे में जो शंकाएं मौजूद हैं वह दूर हो जाएं।ऊपर लिखे गए प्रश्नों के उत्तर का सारांश यह है कि जिस ईश्वरीय शासन पर हम विश्वास रखते हैं और जो यूरोप में प्रसिद्ध है, इन दोनों में धरती और आकाश जैसा अंतर है अतः यह भ्रांति नहीं होनी चाहिए कि ईश्वरीय शासन इस्लाम की दृष्टि में वही शासन है जिसे ईसाई विशेष रूप से कैथोलिक, ईश्वर और पाप के लिए प्रस्तुत करते हैं।राजनीतिक दृष्टिकोण रखने वालों ने शासन के संदर्भ में पाए जाने वाले दृष्टिकोणों को दो भागों में विभाजित किया है।1) अधिनायकतंत्र   2) लोकतंत्रयद्धपि इन दोनों की भी बहुत सी क़िस्में मौजूद है परन्तु सामान्य रूप से शासन दो प्रकार का होता है।1.  ऐसा शासन कि जिसमें शासक स्वंय अपनी इच्


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