रजब-उल-मुरज्जब का महीना

  • News Code : 248618
  • Source : रिजविया डाट नेट
ईमाम मूसा अल काज़िम (अ:स), " रजब बहिश्त में एक नहर है जिस का पानी दूध से ज़्यादा सफ़ेद और और शहद से ज़्यादा शीरीं है, और जो शख्स ईस माह में एक दिन का भी रोज़ा रखेगा, वो ईस नहर से सैराब होगा".
ईमाम मूसा अल काज़िम (अ:स), " रजब बहिश्त में एक नहर है जिस का पानी दूध से ज़्यादा सफ़ेद और और शहद से ज़्यादा शीरीं है, और जो शख्स ईस माह में एक दिन का भी रोज़ा रखेगा, वो ईस नहर से सैराब होगा".

ईसतीग़फ़ार. पवित्र पैग़म्बर (स:अ:व:व) फ़रमाते हैं, "रजब मेरी उम्मत के लिये ईसतीग़फ़ार का महीना है, ईस महीने में ज़्यादा से ज़्यादा ईसतीग़फ़ार करो".

सदक़ा :  सदक़ा देने या दान देने की बहुत अहमियत है

 

बिस्मिल्ला हीर रहमा नीर रहीम


ٌبِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيْم



"या मन यम्लेकू हवा-एज्यस साएलीना व य'लमो ज़मीरस समेतीना लेकुल्ल मसलातिन मिनका सम'उन हाज़ेरून व जवाबुन 'अतीदुन अल्लाहुम्मा व  मवा' ईदोकस सादे'क़तो व आया'दीकल फज़े'लतो व रहमातोकल वासेअत्स  फ़'अस'अलोका अन तू'सल्ले 'अला मोहम्मदीन व आले मोहम्मदीन व अन  ताक़'ज़िया हवा'जिलिद'दुनिया वल आखेरते इन्नका 'अला कुल्ले शै'ईन क़दीर"

अल्लाहूमा सल्ले अला मोहम्मदीन व आले मोहम्मद, अमीन

 


रजब की नियमित दिन की दुआएं व अमाल



1)हज़रत पैग़म्बर (स:अ:व:व) से मंसूब है की जो शख्स ईस दुआ क़ो 100 बार पढ़ेगा और इसके फ़ौरन बाद सदक़ा निकालेगा तो उसपर अल्लाह की रहमत होगी, उसे माफ़ी मिलेगी


अस'तग़ फ़िरुल्लाहा अल-लज़ी ला इलाहा इल्ला हुवा वहदहु ल शरीका लहू व अतुबो इलैही     

.أَسْتَغْفِرُ اللّهَ الَّذِي لا إلهَ إلاّ هُوَ وَحْدَهُ لا شَرِيكَ لَهُ وَأَتُوبُ إلَيْ



बख्शीश चाहता हूँ अल्लाह से जिस के सिवा कोई माबूद नहीं वो यगाना है, इसका कोई शरीक नहीं और मै इसके हुज़ूर तौबा करता हूँ!



2)ईस दुआ क़ो 1000  बार पढ़ने से 1 लाख इनाम का मुस्तहक़ होगा

ला इलाहा इलल-लाहो


لا إلهَ إلاّ اللّهُ

कोई अल्लाह नहीं है सिवाए अल्लाह के


3)70 मर्तबा सुबह और 70 मर्तबा शाम में पढ़ें :

अस'तग़ फिरुल'लाहे व अतुबो इलैही


أَسْتَغْفِرُ اللّهَ وَأَتُوبُ إلَيْهِ.
बख्शीश चाहता हूँ और इसके हुज़ूर तौबा करता हूँ


तब फिर हाथ बुलंद करें और कहें .......


अल्लाहुम्मा अग़फ़िर'ली व'अतूब अलय्या


ُاللّهُمَّ اغْفِرْ لِي وَتُبْ عَلَيَّ.
ऐ माबूद! मुझे बख्श दे और मेरी तौबा क़बूल कर ले!


4) जितनी बार मुमकिन हो दोहरायें

अस'तग़ फ़िरुल्लाहे व अस'अलुहुत तौबा


أَسْتَغْفِرُ اللّه وَأَسْأَلُهُ التَّوْبَةَ.
बख्शीश चाहता हूँ ख़ुदा से जिस के सिवा कोई माबूद नहीं और ईस से तौबा का सवाली हूँ


5)गुनाहों से माफ़ी के लिये ईस दुआ क़ो 1000 बार पढ़ने की ताकीद की गयी है

अस'तग़ फ़िरुल्लाहे ज़ुल'जलाली वल इक्रामी मिन जमी'ई अज़'ज़ुनूबी वल इसमी"


ُأَسْتَغْفِرُ اللّهَ ذَاَ الْجَلالِ وَالإكْرَامِ مِنْ جَمِيعِ الذُّنُوبِ وَالآثَامِ.
बख्शीश चाहता हूँ ख़ुदा से जो साहिबे जलालत व बुज़ुर्गी है, अपने तमाम गुनाहों और ख़ताओं पर माफ़ी चाहता हूँ

6) 100 मर्तबा सुराः तौहीद पढ़ने का बहुत सवाब है, ख़ासकर जुमा के दिन. इसके अलावा कहा गया है की सुराः तौहीद क़ो 100 बार रोज़ाना पढ़ना 100 बरस तक रोज़ा रखने के बराबर है

7) जो शख्स ईस महीने की 3 लगातार दिन का रोज़ा रखेगा (जुमारात, जुमा और सनीचर) तो उसको 100 बरस की ईबादत का सवाब मिलेगा

8) गुनाहों की माफ़ी के लिये रोज़ाना सुबह शाम निम्नलिखित क़ो 3 बार दोहरायें (1 से 10 तक) :


i) सुराः फ़ातिहा ii) आयतल कुर्सी  iii) सुराः काफ़िरून iv) सुराः तौहीद  v) सुराः फ़लक  vi)सुराः नास  (क़ुरानी सुराः के लिये क्लिक्क करें)

vii) कहें, "سُبْحَانَ اللّهِ،وَالْحَمْدُ لِلّهِ،وَلا إلهَ إلاّ اللّهُ،وَاللّهُ أَكْبَرُ،وَلا حَوْلَ وَلا قُوَّةَ إلاّ بِاللّهِ الْعَلِيِّ الْعَظِيمِ. (सुबहान'अल्लाहे वल'हम्दो लील'लाहे व ला इलाहा इलल'लाहो वल'लाहो अकबर व ला हौला वला कुव्वाता इल्ला बिल्लाहिल अलियुल अज़ीम   ख़ुदा पाक है और हम्द इसी के लिये है, ख़ुदा के सिवा कोई माबूद नहीं और अल्लाह बुज़ुर्गतर है और कोई ताक़त व क़ुव्वत ख़ुदा से बड़ी नहीं है, वो सबसे बड़ा है)

viii) अल्लाहुम्मा सल्ले अल्ला मोहम्मदीन व आले मोहम्मद'  اللّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّدٍ وَآلِ مُحَمَّدٍ)

ix)'अल्लाहुम्मा अग़'फ़िरलील मोमिनीना वल मोमिनाती' اَللَّهُمَّ اغْفِرْ لِلْمُؤْمِنِينَ وَالمُؤْمِنَاتِ. (ऐ माबूद! अपने सारे मोमिनों और मोमिनात क़ो बख्श दे)

x) "अस'तग़ फिरुल'लाहे व अतुबो इलैह"  أَسْتَغْفِرُ اللّهَ وَأَتُوبُ إلَيْهِ.

9) हर रात क़ो दो रक्'अत नमाज़ पढ़ें : (मतलब 30 दिन X 2 रक्'अत) : जिसमें सुराः अल-फ़ातिहा 1 मर्तबा, उसके बाद सुराः अल-काफ़रून 3 मर्तबा फिर सुराः इख्लास 1 बार, और जब नमाज़ पूरी हो जाए तो सलाम फेरने के बाद हाथ बुलंद करें और कहें :-

ला इलाहा इलल-लाहो वह'दहू ला'शरीका लहू लहुल मुल्को व लहुल हम्दो यूह'यी व  युमीतु व हुवा हैय्युन ला यमूतु बी'यादिहिल ख़ैर व हुवा अला कुल्ली शै'ईन क़दीर व इलैहिल मस'ईर व ला हौला व ला क़ुव्वाता इल्ला बिल्लाहिल अलियुल अज़ीम, अल्लाहुम्मा सल्ले अला मोहम्मदीन व आले मोहम्मदीन नबी'ईल उम्मिय्यी व आलीही

لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ وَحْدَهُ لَا شَرِيكَ لَهُ   لَهُ الْمُلْكُ وَ لَهُ الْحَمْدُ يُحْيِي وَ يُمِيتُ وَ هُوَ حَيٌّ لَا يَمُوتُ بِيَدِهِ الْخَيْرُ وَ هُوَ عَلَى كُلِّ شَيْ‏ءٍ قَدِيْر   ٌوَإلَيْهِ الْمَصِيرُ،   وَلا حَوْلَ وَلا قُوَّةَ إلاّ بِاللّهِ الْعَلِيِّ الْعَظِيمِ،  اللّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّدٍ النَّبِيِّ الأُمِّيِّ وَآلِهِ.
अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं जो यकता है, कोई इसका शरीक नहीं हुकूमत इसी की और हम्द इसी के लिये है, वो ज़िंदा करता और मौत देता है, वो ज़िंदा है, इसे मौत नहीं, पर भलाई इसी के हाथ में है और वो हर चीज़ पर कुदरत रखता है और बाज़-गुश्त (पूछ-ताछ) इसी की तरफ़ है, कोई नहीं है जो ख़ुदा से बुलंद व बुज़ुर्ग है, ऐ माबूद! नबी-ए-उम्मी मोहम्मद (स:अ:व:व) और इनकी आल (अ:स) पर रहमत फ़रमा!

10 ) सैय्यद इब्ने तावूस, हज़रत पैग़म्बर (स:अ:व:व) से मंसूब करके फ़रमाते हैं की अगर कोई शख्स जुमा के दिन ज़ोहर और असर की नमाज़ के बीच 4 रक्'अत नमाज़ पढ़े, जिसकी हर रक्'अत में 1 मर्तबा सुराः अल-फ़ातिहा, 7 मर्तबा आयतल कुर्सी और 5 मर्तबा सुराः अल-तौहीद पढ़े और उसके बाद 10 बार यह दुआ पढ़े:

बख्शीश चाहता हूँ ख़ुदा से जिस के सिवा कोई माबूद नहीं और ईस से तौबा का सवाली हूँ

अस'तग़ फ़िरुल्लाहे व अस'अलुहुत  तौबा

أَسْتَغْفِرُ اللّه وَأَسْأَلُهُ التَّوْبَةَ.

तो अल्लाह उसके हक़ में 1000 सवाब रोज़ाना के हिसाब ऐसे लिखेग़ा जो नमाज़ पढ़े जाने वाले दिन से लेकर उस की मौत के दिन तक होगा, और उसे हर सुराः पढ़ने के बदले जन्नत का एक शहर देगा जो मणिक से बना होगा, और उसे जन्नत में सफ़ेद मोतियों से बना एक महल देगा जो क़ुरानी सूरा के हर एक लफ्ज़ पढ़ने के बदले मो होगा और उसकी ख़िदमत में हूरें देगा और उससे ख़ुदा राज़ी होगा और उसे अपने मोमिन में से क़रार देगा और उसकी ज़िन्दगी खिशियों और अपनी रहमत से भर देगा और...........वगैरा वगैरा


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सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह ख़ामेनई का हज संदेश
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