आयतुल्लाह जाफरूल हादी

वास्तविकता क्या है? शिया समुदाय भाग 2

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वर्तमान युग में शिया समुदाय मुसलमानों का बड़ा समुदाय है, जिसकी कुल संख्या मुसलमानों की प्रायः एक चौथाई है और इस समुदाय की इतिहासिक जड़ें सदरे इस्लाम के उस दिन से शुरु होती हैं कि जिस समय सूर ए बय्यनह की यह आयत अवतीर्ण हुई थी

1. वर्तमान युग में शिया समुदाय मुसलमानों का बड़ा समुदाय है, जिसकी कुल संख्या मुसलमानों की प्रायः एक चौथाई है और इस समुदाय की इतिहासिक जड़ें सदरे इस्लाम के उस दिन से शुरु होती हैं कि जिस समय सूर ए बय्यनह की यह आयत अवतीर्ण हुई थी:

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(सूर ए बय्यना आयत 7) 

निः संदेह जो लोग विश्वास लाये और अमले सालेह अर्थात अच्छे कार्य अंजाम दिया वही सर्वश्रेष्ठ व उत्तम प्राणी हैं।

चुनाँचे जब यह आयत अवतीर्ण हुई तो रसूले इस्लाम (स) ने अपना हाथ अली (अ) के शाने पर रखा उस समय सखागण व मित्रगण भी वहाँ मौजूद थे और आपने फ़रमाया:

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ऐ अली, तुम और तुम्हारे शिया सर्वश्रेष्ठ व उत्तम प्राणी हैं।

इस आयत की व्याख्या के निम्न में देखिये, तफ़सीरे तबरी (जामेउल बयान), दुर्रे मंसूर (तालीफ़, अल्लामा जलालुद्दीन सुयुती शाफ़ेई), तफ़सीरे रुहुल मआनी तालीफ़ आलूसी बग़दादी शाफ़ेई।

इसी वजह से यह समुदाय जो कि इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ) की फ़िक़ह में उनका अनुगामी होने के आधार पर उनसे सम्बंधित है। शिया समुदाय के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

2. शिया समुदाय बड़ी संख्या में ईरान, इराक़, पाकिस्तान, हिन्दुस्तान, में जीवन व्यवतीत करता है, इसी प्रकार उस की एक बड़ी संख्या खाड़ी देशों तुर्की, सीरिया (शाम), लेबनान, रूस और उससे अलग होने वाले बहुत से नये देशों में मौजूद हैं, तथा यह समुदाय यूरोपी देशों जैसे इँगलैंड, फ़्रास, जर्मनी और अमेरिका, इसी प्रकार अफ़्रीक़ा के देशों और पूर्वी एशिया में भी फ़ैला हुआ है, उन स्थानों पर उनकी मस्जिदें और ज्ञानात्मक, सांस्कृतिक और समाजी केंद्र भी हैं।

3. इस समुदाय के लोग यद्धपि विभिन्न देशों, राष्ट्रों और रंग व वंश से सम्बंध रखते हैं परन्तु इसके बावजूद अपने दूसरे मुसलमान भाईयों के साथ बड़े प्यार व प्रेम से रहते हैं और समस्त सरल या कठिन मैदानों में सच्चे दिल और निःस्वार्थता के साथ उनकी सहायता करते हैं और यह सब ईश्वर के इस आदेश पर अमल करते हुए इसे अंजाम देते हैं:

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(सूर ए हुजरात आयत 10) 

मोमिनीन अर्थात आस्तिक आपस में भाई भाई हैं।

या इस ईश्वर के कथन पर अमल करते हैं:

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नेकी और तक़वा अर्थात आत्मनिग्रह में एक दूसरे की सहायता करो।

(सूर ए मायदा आयत 2) 

और ईश्वर के रसूल (अ) के इस कथन की पाबंदी करते हुए:

1. (.................................................)

(मुसनदे महत्वपूर्णद बिन हम्बल जिल्द 1 पेज 215)

मुसलमान आपस में एक दूसरे के लिये एक हाथ के प्रकार हैं।

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या आपका यह कथन उन के लिये मार्ग दर्शन है:

2. (...................................................)

मुसलमान सब आपस में एक शरीर के प्रकार हैं।

(अस सहीहुल बुख़ारी, जिल्द 1 किताबुल साहित्य पेज 27)

4. पूरे इस्लामी इतिहास में ईश्वरीय धर्म और इस्लामी राष्ट्र की प्रतिक्षा के बारे में इस समुदाय की एक महत्वपूर्ण और स्पष्ट भूमिका रही है जैसे उसकी हुकुमतों, रियासतों ने इस्लामी संस्कृति व सभ्यता की सदैव सेवा की है, तथा इस समुदाय के विद्धानों और बुद्धिजीवियों ने इस्लामी सम्पित को धनी बनाने और बचाने के बारे में विभिन्न ज्ञानात्मक और प्रायोगिक मैदानों में जैसे हदीस, तफसार, धार्मिक सिद्धांत, फ़िक्ही सिद्धांत, नैतिक, देराया, रेजाल, दर्शन शास्त्र, उपदेश, शासन, सामाजिक कार्य, भाषा व साहित्य बल्कि चिकित्सा व भौतिक विज्ञान रसायन विज्ञान, गणित, ज्योतिष और उसके अतिरिक्त बहुत ज्ञानों के बारे में लाख़ों किताबें लिखके इस बारे में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है बल्कि बहुत से ज्ञानों का आधार रखने वाले विद्धान इसी समुदाय से सम्बंध रखते हैं।[1]

5. शिया समुदाय विश्वस्नीय है कि ईश्वर अहद व समद अर्थात एक व निःसपृह है, न उसने किसी को जना है और न उसे किसी ने जन्म दिया है और न ही कोई उसका समकक्ष है और उससे जिस्मानियत, दिशा, स्थान, समय, परिवर्तन, गतिविधि, उतार व चढाव आदि जैसी विशेषताएं जो उसकी महिमा, गौरव व सुंदरता के अनुकूल नही हैं, उनको नकारता है।

और शिया यह विश्वास रखते हैं कि उसके अतिरिक्त कोई पूज्य एंव उपास्य नही है, आदेश और तशरीअ (धर्म शास्त्र के क़ानून बनाना) केवल उसी के हाथ में है और हर प्रकार का शिर्क अर्थात अनेकेश्वरवाद चाहे वह गुप्त हो या प्रकट, एक महान अत्याचार और एक अक्षम्य पाप है।

और शियों ने यह धार्मिक सिद्धांत: शुद्ध बुद्धि से प्राप्त किये है,जिनका पुष्ठि ईश्वर की किताब और सुन्नते शरीफ़ से भी होती है।

और शियों ने अपने धार्मिक सिद्धांतों के मैदान में उन हदीसों पर भरोसा नही किया है जिन में इसराईलियात (जाली तौरेत और इंजील) और मजूसीयत की गढी हुई बातों का मिश्रण है, जिन्होने ईश्वर को इंसान के प्रकार माना है और वह उसकी उपमा मख़लूक़ अर्थात सृष्टि से देते हैं या फ़िर उसकी ओर अत्याचार और व्यर्थ व निष्क्रय जैसे कार्यों को उससे जोडते हैं, हालाँकि ईश्वर इन समस्त बातों से अत्यन्त उच्च व त्रेष्ठ है या यह लोग ईश्वर के पवित्र, मासूम अर्थात निर्दोष नबियों की ओर बुराईयों और कुरूप बातों की निस्बत देते हैं।

6. शिया विश्वास रखते हैं कि ईश्वर न्यायशील व नीतिज्ञ है और उसने न्याय व नीति से पैदा किया है, चाहे वह निश्चल हो या वनस्पति, पशु हो या मानव, आकाश हो या धरती, उसने कोई चीज व्यर्थ नही पैदा की है, क्योकि व्यर्थ (फ़ुज़ूल या बेकार होना) न केवल उसके न्याय व नीति के विरूद्ध है बल्कि उसके ईश्वरत्व के भी विरूद्ध है जिसका लाज़िमा है कि ईश्वर के लिये समस्त उपलब्धियों को प्रमाणित किया जाये और उससे हर प्रकार के अभाव और कमी को नकारा जाये।

7. शिया यह विश्वास रखते हैं कि ईश्वर ने न्याय व नीति के साथ प्रकृति के आरम्भ से ही उसकी ओर अंबिया अर्थात ईशदूतों और रसूलों को मासूम अर्थात निर्दोष बना कर भेजा और फिर उन्हे विस्तृत ज्ञान से सुसज्जित किया जो वही अर्थात ईस्वरीय वाणी के द्वारा ईश्वर की ओर से उन्हे प्रदान किया गया और यह सब कुछ इंसान के मार्ग दर्शन और उसे उसकी खोई हुई सुंदरता तक पहुचाने के लिये था ता कि उसके द्वारा ऐसे आज्ञा पालन की ओर भी उसका मार्ग दर्शन हो जाये जो उसे स्वर्गीय बनाने के साथ साथ प्रतिपालक की प्रसन्नता और उसकी कृपा का पात्र क़रार दे और उन अंबिया अर्थात ईशदूतों के मध्य आदम, नूह, इब्राहीम, मूसा, ईसा और हज़रत मुहम्मद मुसतफ़ा (स) सबसे प्रसिद्ध हैं जिनका वर्णन क़ुरआने मजीद में आया है या जिन के नाम और विशेषताएं हदीसों में बयान हुई हैं।


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सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह ख़ामेनई का हज संदेश
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