• आख़री नबी हज़रत मुहम्मद स. का संक्षिप्त जीवन परिचय।

    पैग़म्बरो में सबसे सर्वश्रेष्ठ और सबसे महान आख़री नबी हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा स.अ हैं जिनकी ज़िन्दगी और कैरेक्टर को अल्लाह नें क़यामत तक के इन्सानों के लिये मॉडल बनाया है।

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  • एकता सप्ताह 12 रबीउल अव्वल से 17 रबीउल अव्वल।

    सुन्नी मुसलमान 12 रबीउल अव्वल जबकि शीया मुसलमान 17 रबीउल अव्वल को पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम का जन्म दिवस मनाते हैं। वर्षों पहले ईरान की इस्लाम क्रांति के संस्थापक स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी ने इस्लामी जगत में एकता का नारा लगाया और उन्होंने इस बात का प्रयोग मुसलमानों तथा विभिन्न संप्रदायों को एक दूसरे से निकट लाने के लिए किया और इन दोनों तारीख़ों के मध्य अंतर को मुसलमानों के मध्य “हफ्तये वहदत” अर्थात एकता सप्ताह के रूप में मनाये जाने की घोषणा की। यह सप्ताह इस्लामी जगत में विशेषकर इस समय एकता व एकजुटता की आवश्यकता को बयान करने का बेहतरीन अवसर है क्योंकि इस समय दुनिया विशेषकर इस्लामी जगत को संकटों व समस्याओं का सामना है और एकता व एकजुटता से बहुत सी समस्याओं का समाधान किया जा सकता है। यद्यपि विभिन्न संप्रदायों के मुसलमानों के मध्य कुछ धार्मिक आदेशों में मतभेद है परंतु बहुत से मामलों में उनके मध्य समानता है जैसे ईश्वर एक है ,क़ुरआन एक है, पैग़म्बर एक है और क़िबला एक है। इसी प्रकार महत्वपूर्ण धार्मिक उपासनाओं को अंजाम देने में उनके मध्य समानता है जैसे नमाज़ पढ़ने, रोज़ा रखने, हज करने और ज़कात देने आदि

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  • हज़रत इमाम हसन असकरी अ.स. का संक्षिप्त जीवन परिचय।

    8 रबीउल अव्वल को हज़रत इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम का शहादत दिवस है। उन्होंने अपनी 28 साल की ज़िन्दगी में दुश्मनों की ओर से बहुत से दुख उठाए और अब्बासी शासक ‘मोतमद’ के किराए के टट्टुओं के हाथों इराक़ के सामर्रा इलाक़े में ज़हर से आठ दिन तक दर्द सहने के बाद शहीद हो गए

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  • 28 सफ़र, दोहरा ग़म

    पैग़म्बरे इस्लाम स.अ. की वफ़ात

    इलाही पैग़म्बरों ने दीन के पौधे की सिंचाई की क्योंकि उन्हें इंसानी समाजों में भलाई फैलाने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई थी। उनका उद्देश्य समाज में तौहीद को फैलाना, अद्ल व न्याय की स्थापना और अंधविश्वास व जेहालत से लोगों को दूर कर कमाल (परिपूर्णतः) की ओर मार्गदर्शन करना था। इलाही पैग़म्बरों की ज़ंजीर की आख़री कड़ी पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम हैं। कृपा व मेहरबानी के प्रतीक पैग़म्बरे इस्लाम ने उस इमारत को पूरा किया जिसकी आधारशिला पहले वाले इलाही पैग़म्बरों ने रखी थी।

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  • इमाम हुसैन अ.स. का चेहलुम

    आशूर के दिन जब करबला के मैदान में रसूले इस्लाम स.अ. के नवासे इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को भूखा और प्यासा शहीद कर दिया गया और उसके बाद उनके परिवार और रिश्तेदारों के ख़ैमों को आग के हवाले कर दिया गय तो दुश्मन यह सोच रहा था कि अब तो सब कुछ ख़त्म हो चुका है।

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  • इमाम हुसैन अ. अहलेसुन्नत की निगाह में

    इमाम हुसैन अ. रसूले इस्लाम स.अ. की ज़बानी

    हर बाप की इच्छा और तमन्ना होती है कि उसका बेटा ऐसा हो कि उसके व्यक्तित्व का उत्तराधिकारी, उसके संदेश का रक्षक और उसके मिशन को आगे बढ़ाने वाला हो। चूंकि इमाम हुसैन अ. ने अपने आंदोलन और अभूतपूर्व बलिदान द्वारा पैगम्बरे इस्लाम स.अ. के संदेश और मिशन को अमर बना दिया है इसलिए पैगम्बर स.अ. आपके बारे में फ़रमाते हैं, मैं हुसैन से हूँ, यानी मेरी रिसालत, मेरे संदेश व मिशन, हुसैन के कारण बाक़ी बचेगा।

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  • हजरते मासूमा स.अ. का जन्मदिवस।

    हज़रते फ़ातेमा मासूमा स.अ. इस्लामी इतिहास की एक महत्वपूर्ण हस्ती का नाम है। आप शियों के सातवें इमाम, हज़रत इमाम मूसा काज़िम अ.स. की बेटी और आठवें इमाम, हज़रत इमाम रेज़ा अ.स. की बहन हैं आप बहुत छोटी थीं तभी आपके बाबा इमाम मूसा काज़िम अ.स. को शहीद कर दिया गया और आपकी शिक्षा और प्रशिक्षण आपके भाई इमाम रेज़ा अ.स. ने किया

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  • अत्याचारी बादशाहों के दौर में इमाम सादिक़ अ. नें आंदोलन क्यों नहीं किया।

    इमाम सादिक़ अ. के ज़माने के बादशाहों के विरुद्ध होने वाले अक्सर आंदोलनों में इमाम सादिक़ अ. की मर्ज़ी शामिल नहीं थी। और आप आंदोलन के अगुवाओं की ओर की जाने वाली अपील को जो आपकी मदद और सहयोग का वादा करते थे, स्वीकार नहीं करते थे। और अहलेबैत अलैहिस्सलाम की शिक्षाओं को प्रचलित करने को प्राथमिकता देते थे।

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  • हज़रत अली की शहादत की याद में दुनिया एक बार फिर ग़मगीन।

    ईरान समेत दुनिया भर में शिया मुसलमानों के पहले इमाम और विश्व में न्याय एवं वीरता के प्रतीक हज़रत अली (अ) की शहादत का सोग मनाया जा रहा है।

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  • वह अजनबी कौन था?

    एक कमज़ोर औरत पानी से भरी मश्क बड़ी मुश्किल से ले जा रही थी। रास्ते में उसे एक आदमी मिला उसनें औरत से पानी की मश्क ली और उसके घर का पता पूछ कर आगे आगे चलने लगा। छोटे छोटे बच्चे अकेले घर पर माँ का इन्तेज़ार कर रहे थे। बच्चों नें दूर से माँ को देखा तो दौड़ कर उसके पास आए लेकिन उन्हें यह देख कर आश्चर्य हुआ कि आज पानी की मश्क उनकी माँ के बजाए एक अजनबी आदमी नें उठा रखी थी।

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  • इमाम मेहदी (अ) के जन्मदिवस पर पूरी दुनिया में जश्न और ख़ुशी का माहौल।

    विश्व भर विशेष रूप से मध्यपूर्व और भारतीय उपमहाद्वीप में करोड़ों शिया मुसलमान बाहरवें और अंतिम इमाम हज़रत मोहम्मद मेहदी अलैहिस्साल के जन्मदिन की वर्षगांठ के अवसर पर भव्य समारोहों का आयोजन करके और एक दूसरे को बधाईयां देकर जश्न मना रहे हैं।

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  • इमाम महदी अ.ज. की वैश्विक हुकूमत में हज़रत ईसा अ. की भूमिका।

    वैश्विक हुकूमत की बागडोर हज़रत इमाम महदी के हाथों में होगी और हज़रत ईसा अ. क़ुरआन के मूल्यों को प्रचलित करने में आपकी मदद करेंगे।

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  • इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम का जन्मदिवस।

    इमाम अली इब्ने हुसैन अलैहिमुस्सलाम, ज़ैनुल आबेदीन और सज्जाद के नाम से मशहूर हैं और मशहूर रेवायत के अनुसार आपका जन्म वर्ष 38 हिजरी में शाबान के महीने में मदीना शहर में हुआ। कर्बला की घटना में आप 22 या 23 साल के जवान थे और मुस्लिम इतिहासकारों के अनुसार आप उम्र के लिहाज से अपने भाई अली अकबर अलैहिस्सलाम से छोटे थे।

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  • जनाब अब्बास अलैहिस्सलाम का संक्षिप्त जीवन परिचय।

    4 शाबान 26 हिजरी को मदीना में हज़रत अमीरूल मोमेनीन और उम्मुल बनीन के नामवर बेटे जनाबे अब्बास अलैहिस्सलाम का शुभजन्म हुआ। आपकी माँ हेज़ाम बिन खालिद की बेटी थीं, उनका परिवार अरब में बहादुरी और साहस में मशहूर था।

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  • इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम का जन्म दिवस

    आज पवित्र नगर मदीना में इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम का घर प्रकाशवान है। पूरा मदीना नगर इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम के सुपुत्र इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम के आगमन से प्रकाशमय है। इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम का नाम मोहम्मद था और उनकी उपाधि बाक़िरूल उलूम अर्थात ज्ञानों को चीरने वाला है। इस उपाधि का कारण यह है कि इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम ने विभिन्न ज्ञानों के रहस्यों को स्पष्ट किया और उन्हें एक दूसरे से अलग किया।

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  • इमाम हुसैन अ.ह. के दोस्तों और दुश्मनों पर एक निगाह।

    इमाम हुसैन अ.ह. के हरम, इतिहास के हर दौर में एक ओर से ख़लीफ़ाओं और बेदीनों की दुश्मनी और दूसरी ओर जनता के प्रेम और उनके प्यार की धुरी है, अब्बासियों की हुकूमत के आरंभ में, इमाम हुसैन अ.ह. की पाक क़ब्र की ज़ियारत का रास्ता मुसलमानों के लिए खोला गया और यह सिलसिला हारून रशीद को समय तक चलता रहा जो पांचवां अब्बासी ख़लीफ़ा था और 193 हिजरी में उसने इमाम हुसैन अ.ह. की पाक क़ब्र और उसके आसपास के सभी घरों को उजाड़ दिया।

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  • हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा ने कर्बला को अमर बना दिया।

    हज़रत ज़ैनब इस्लामी इतिहास में एक महान महिला का नाम है जो आसमान पर जगमगा रहा है कि जिसका व्यक्तित्व उच्चतम नैतिक गुणों का संपूर्ण आदर्श है। ऐसी महिला जिसने अपने नर्म, दयालु व मेहरबानी दिल के साथ मुसीबतों के पहाड़ों को सहन किया।

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  • चेहलुम, इमाम हुसैन की ज़ियारत पर पैदल जाने का सवाब

    पैदल ज़ियारत पर जाना एक प्रकार से इन्सान के सारे पापों का प्राश्चित है, और इन्सान जब इस जियारत से वापस आता है तो ऐसा ही हो जाता है कि जैसे वह अभी अभी अपनी माँ के गर्भ से पैदा हुआ हो और पूर्णरूप से पापो से दूर और उसकी आत्मा पवित्र हो,

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  • आशूरा के आमाल

    रोज़े आशूरा मुहम्मद और आले मुहम्मद (स.अ.) पर मुसीबत का दिन है। आशूर के दिन इमाम हुसैन अ. ने इस्लाम को बचाने के लिए अपना भरा घर और अपने साथियों को ख़ुदा की राह में क़ुर्बान कर दिया है, हमारे आइम्मा-ए-मासूमीन अ. ने इस दिन को रोने और शोक मनाने से विशेष कर दिया है अत: आशूरा के दिन रोने, मजलिस व मातम करने और अज़ादारी की बहुत ताकीद की गई है।

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  • 9 मुहर्रम की रातः

    शबे आशूर के आमाल

    अल्लाह पाक व पाकीज़ा है सारी तारीफ़ उसी अल्लाह के लिए है अल्लाह के अतिरिक्त कोई माबूद (जिसकी इबादत की जाए) नहीं है अल्लाह सबसे बड़ा है और उसके अतिरिक्त किसी के पास कोई ताक़त और शक्ति नहीं है वह महान और सर्वश्रेष्ठ है।

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  • कर्बला में औरतों की भूमिका।

    हज़रत ज़ैनब (स) और उनके हम क़दम और हम आवाज़ उम्मे कुलसूम अ., रुक़य्या अ, रबाब अ., लैला अ., उम्मे फ़रवह अ., सकीना अ., फ़ातिमा अ. और आतेका अ. तथा इमाम (अ) के असहाब व अंसार की त्यागी औरतों ने बहादुरी और त्याग व बलिदान के वह इतिहास रचा है जिसको किसी भी सूरत इतिहास के पन्नों से मिटाया नहीं जा सकता इसलिए आशूरा को इमाम हुसैन (अ) की शहादत के बाद जब अहले हरम के ख़ैमों में आग लगा दी गई बीबियों के सरों से चादरें छीन ली गईं तो जलते खैमों से निकलकर मज़लूम औरतें और बच्चे कर्बला की जलती रेत पर बैठ गए।

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  • इस्लाम के बाक़ी रहने में इमाम हुसैन अ.ह के आंदोलन की भूमिका।

    हज़रत इमाम हुसैन अ. ने अपने रिश्तेदारों और साथियों के साथ इस्लाम को क़यामत तक के लिये अमर बना देने के लिए महान बलिदान दिया है। इस रास्ते में इमाम किसी क़ुरबानी से भी पीछे नहीं हटे, यहां तक ​​कि छः महीने के दूध पीते बच्चे को भी इस्लाम के लिए क़ुरबान कर दिया ताकि इस्लाम बच जाये।

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  • शिया सुन्नीः

    इस्लामी भाईचारा

    इस्लाम की निगाह में सब इंसान बराबर हैं और कोई क़ौम या क़बीला तथा कोई रंग व नस्ल एक दूसरे पर वरीयता नहीं रखता और धन दौलत या ग़रीबी, बड़ाई या श्रेष्ठता का आधार नहीं है बल्कि उसकी निगाह में सदाचार के अतिरिक्त बड़ाई का हर आधार निराधार है

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  • इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम ग़ैरों की ज़बानी।

    शियों के छठे इमाम का नाम, जाफ़र कुन्नियत (उपनाम), अबू अब्दुल्लाह, और लक़ब (उपाधि) सादिक़ है। आपके वालिद इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम और माँ जनाबे उम्मे फ़रवा हैं। आप 17 रबीउल् अव्वल 83 हिजरी में पैदा हुए और 114 हिजरी में इमाम बने।

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  • इमाम हसन (अ) के दान देने और क्षमा करने की कहानी।

    एक दिन इमाम हसन (अ) घोड़े पर सवार कहीं जा रहे थे कि शाम अर्थात मौजूदा सीरिया का रहने वाला एक इंसान रास्ते में मिला। उस आदमी ने इमाम हसन को बुरा भला कहा और गाली देना शुरू कर दिया। इमाम हसन (अ) चुपचाप उसकी बातें सुनते रहे, जब वह अपना ग़ुस्सा उतार चुका तो इमाम हसन (अ) ने उसे मुसकुरा कर सलाम किया और कहने लगेः.......

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  • इमाम महदी अलैहिस्सलाम की हुकूमत।

    महदी (अलैहिस्सलाम) मेरी संतान में से हैं, उसका नाम मेरा नाम, उसकी कुन्नियत मेरी कुन्नियत, उसकी शक्ल व विशेषताएँ मेरी शक्ल और विशेषताएँ और उसकी शैली मेरी शैली है। वह लोगों को मेरी शरीयत पर स्थापित रखेगा और उन्हें किताब अल्लाह की तरफ़ दावत देगा।

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  • 3 शाबान, इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का जन्म दिन।

    हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने इंसानों को प्रतिष्ठा व इज़्ज़त का रास्ता दिखाकर इतिहास में चमक रहे हैं। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अत्याचार के मुकाबले में पूरी इंसानियत को आज़ादी का सबक़ दिया है, उसे इंसानियत कभी भुला नहीं सकती और हर इंसान इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से ख़ास लगाव रखता है।

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Quds cartoon 2018
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