• हज़रत फ़ातेमा ज़हरा स. बेहतरीन आदर्श

    हम एक नज़र उनकी ज़िन्दगी के कुछ महत्वपूर्ण पहलुओं पर डालते हैं और देखते हैं कि उनका चरित्र क्या था और क्योंकि ख़ुदा नें उनको हमारे लिये आईडियल बनाया है इसलिये हम उनसे कुछ सीख कर अपने जीवन में लागू करें।

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  • हज़रत ज़ैनब स.अ की ज़िंदगी पर एक निगाह।

    हज़रत ज़ैनब (अ) ने बचपन के दिनों में अपने बाबा हज़रत अली (अ) से पूछा: बाबा जान! क्या आप हमें प्यार करते हैं? अमीरूल मोमेनीन हज़रत अली (अ) ने फ़रमाया: मैं तुमसे प्यार क्यों न करूँ, तुम तो मेरे दिल का तुकड़ा हो।

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  • हज़रत मासूमा स. का एक संक्षिप्त परिचय।

    हज़रत मासूमा स. (अ) शियों के सातवें इमाम मूसा काज़िम (अ) की बेटी हैं, उसकी माँ हज़रत नजमा ख़ातून हैं, हज़रत मासूमा स. (अ) पहली ज़ीकाद 173 हिजरी में मदीना मुनव्वरा में पैदा हुईं।

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  • इमाम हुसैन अ. के कितने भाई कर्बला में शहीद हुए।

    कर्बला में जिन नेक और अच्छे इंसानों ने सह़ी और कामयाब रास्ते को अपनाया और अपने ज़माने के इमाम के नेतृत्व में बुरे लोगों के मुक़ाबले, अपनी ख़ुशी के साथ जंग की और शहीद हुए उनमें से कुछ वीर ह़ज़रत अली (अ.स) के बेटे भी थे जो अमीरूल मोमिनीन अ. की तरफ़ से इमाम ह़ुसैन अलैहिस्सलाम के भाई थे, इतिहास की किताबों में उनकी संख्या 18 बताई गई है।

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  • ईदे मुबाहेला:

    इस्लाम व अहलेबैत की जीत का दिन।

    नजरान क्षेत्र के ईसाईयों के धार्मिक नेता एक चटान के ऊपर जाते हैं। बुढ़ापे के कारण उनके जबड़े और सफ़ेद दाढ़ी के बालों में कंपन है। वह कांपती हुई आवाज़ में कहते हैं कि मेरे विचार में मुबाहिला करना उचित नहीं होगा। यह पांच नूरानी चेहरे जिन्हें मैं देख रहा हूं अगर दुआ कर देंगे तो धरती में धंसे पहाड़ उखड़ जाएंगे। अगर मुबाहिला हुआ तो हमारी तबाही निश्चित है और यह भी आशंका है कि अल्लाह के अज़ाब समूचे दुनिया के ईसाई समुदाय को अपनी चपेट में ले ले।

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  • सबसे बड़ी ईद,ईदे ग़दीर।

    ग़दीर मक्के से 64 किलोमीटर दूरी पर स्थित अलजोहफ़ा घाटी से तीन से चार किलोमीटर दूर एक जगह थी जहां तालाब था। इसके आस पास पेड़ थे। क़ाफ़िले वाले इसकी छाव में अपने सफ़र की थकान उतारते और साफ़ और मीठे पानी से अपनी प्यास बुझाते थे। समय बीतने के साथ यह छोटा सा तालाब एक अथाह झील में तब्दील हो गया कि जहां से हजरत अली अलैहिस्सलाम को पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिही वसल्लम का जानशीन (उत्तराधिकारी) बनाए जाने की घटना का मैसेज पूरी दुनिया में फैल गया।

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  • अरफ़ा, दुआ, इबादत और अल्लाह के नज़दीक होने का दिन।

    दुआ इबादत की रूह है। जो इबादत दुआ के साथ होती है वह प्रेम और परिज्ञान को उपहार स्वरूप लाती है। दुआ ऐसी आत्मिक स्थिति है कि जो इंसान और उसके जन्मदाता के बीच मोहब्बत एवं लगाव पैदा करती है। दुआ से जीवन के प्रति सकारात्मक सोच पैदा होती है। पैग़म्बरे इस्लाम (स) फ़रमाते हैं, सर्वश्रेष्ठ इंसान वह है कि जो इबादत और दुआ से लगाव रखता हो।

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  • अमीरुल मोमेनीन हज़रत अली अ. और हज़रत ज़हरा की शादी।

    एक सफल वैवाहिक जीवन के लिए ज़रूरी है कि घर की जिम्मेदारियां और काम बाट लिए जाएँ। कछ काम पति के जिम्मे हों और कुछ पत्नी के जिम्मे। ताकि सारा बोझ एक के कंधों पर न पड़े। अलबत्ता इसका मतलब यह नहीं है कि वह उन जिम्मेदारियों में एक दूसरे का साथ न दें और एक दूसरे का सहयोग न करें बल्कि ज़रूरी है कि जहां पति पत्नी के कामों में उसका हाथ बंटा सकता है, उसका हाथ बटाए और अगर पत्नी पति के कामों में उसकी मदद कर सकती है तो ज़रूर करे.........................

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  • एक सात साल का बच्चा इमाम कैसे हो सकता है?

    बग़दाद के अस्सी उलमा और बुज़ुर्गों ने जब हज के मौसम में इमाम मोहम्मद तक़ी अ. से मुलाक़ात की तो आपने उनके हर सवाल का जवाब दिया और उनके लिए साबित हो गया कि आप वास्तव में इमाम हैं और मामून ने आपकी कमसिनी के बावजूद जब आपको अपना दामाद बनाया तो अब्बासियों की ओर से आलोचना हुई कि तुमने उन्हें अपना दामाद क्यों बनाया है? तो मामून ने कहा: मैं उनके इल्म और गुणों को देखते हुए उन्हें अपना दामाद बनाया है और फिर बड़े बड़े उलमा......

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  • इमाम अली रज़ा अ. का संक्षिप्त जीवन परिचय।

    इमाम अली रेज़ा अ. मदीने में सन 148 हिजरी में पैदा हुए और सन 203 हिजरी में मामून अब्बासी के हाथों शहीद हुए। आपके वालिद इमाम मूसा काज़िम अ. शियों के सातवें इमाम हैं, आपकी माँ का नाम ताहिरा था और जब उन्होंने इमाम रेज़ा अ. को जन्म दिया था तो इमाम मूसा काज़िम अ. ने उन्हें ताहिरा का नाम दिया।

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  • हज़रत फ़ातेमा ज़हरा स. का संक्षिप्त जीवन परिचय।

    जनाबे फ़ातिमा ज़हरा स. की श्रेष्ठता दिल और आत्मा को इस तरह अपनी तरफ़ खींचती है कि इन्सान की ज़बान बंद हो जाती है। जो भी उनकी श्रेष्ठता और ख़ुदा और उसके रसूल की नज़र में उनके मरतबे को देखता है वह देखता ही रह जाता है कि यह बीबी कितनी महान बीबी थीं। उन्हें समझने के लिये इन्सान के पास दूरदर्शिता और बसीरत होनी चाहिये। शायद हम जैसे इन्सान न समझ पाएं, हाँ उन्हें जानने के लिये उन आयतों और हदीसों से मदद ली जा सकती है जिनमें उनकी श्रेष्ठता बयान की गई है।

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  • जनाबे फ़ातिमा ज़हरा स. विलायत के आसमान का एक तारा।

    यह तारा आसमान वालों के लिये चमकता है। यह तारा हमारे लिये हिदायत का तारा है। हमनें हिदायत के इस तारे से क्या पाया है? हमारे लिये ज़रूरी है कि इस चमकते तारे की रौशनी में ख़ुदा और ख़ुदा के रास्ते की खोज करें। वह रास्ता जिसे सीधा रास्ता कहते हैं, जिस रास्ते पर ख़ुद बीबी ज़हरा स. चली हैं। आपका जन्म भी एक ख़ास चीज़ से हुआ है। ख़ुदा यह बात जानता था कि यह महान औरत दुनिया में हर एम्तेहान और परीक्षा में सफल होगी इसलिये इसके जन्म का इंतेज़ाम भी ख़ास तरीक़े से किया।

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  • आख़री नबी हज़रत मुहम्मद स. का संक्षिप्त जीवन परिचय।

    पैग़म्बरो में सबसे सर्वश्रेष्ठ और सबसे महान आख़री नबी हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा स.अ हैं जिनकी ज़िन्दगी और कैरेक्टर को अल्लाह नें क़यामत तक के इन्सानों के लिये मॉडल बनाया है।

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  • हज़रत इमाम हसन असकरी अ.स. का संक्षिप्त जीवन परिचय।

    8 रबीउल अव्वल को हज़रत इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम का शहादत दिवस है। उन्होंने अपनी 28 साल की ज़िन्दगी में दुश्मनों की ओर से बहुत से दुख उठाए और अब्बासी शासक ‘मोतमद’ के किराए के टट्टुओं के हाथों इराक़ के सामर्रा इलाक़े में ज़हर से आठ दिन तक दर्द सहने के बाद शहीद हो गए

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  • 28 सफ़र, दोहरा ग़म

    पैग़म्बरे इस्लाम स.अ. की वफ़ात

    इलाही पैग़म्बरों ने दीन के पौधे की सिंचाई की क्योंकि उन्हें इंसानी समाजों में भलाई फैलाने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई थी। उनका उद्देश्य समाज में तौहीद को फैलाना, अद्ल व न्याय की स्थापना और अंधविश्वास व जेहालत से लोगों को दूर कर कमाल (परिपूर्णतः) की ओर मार्गदर्शन करना था। इलाही पैग़म्बरों की ज़ंजीर की आख़री कड़ी पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम हैं। कृपा व मेहरबानी के प्रतीक पैग़म्बरे इस्लाम ने उस इमारत को पूरा किया जिसकी आधारशिला पहले वाले इलाही पैग़म्बरों ने रखी थी।

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  • इमाम हुसैन अ.स. का चेहलुम

    आशूर के दिन जब करबला के मैदान में रसूले इस्लाम स.अ. के नवासे इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को भूखा और प्यासा शहीद कर दिया गया और उसके बाद उनके परिवार और रिश्तेदारों के ख़ैमों को आग के हवाले कर दिया गय तो दुश्मन यह सोच रहा था कि अब तो सब कुछ ख़त्म हो चुका है।

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  • इमाम हुसैन अ. अहलेसुन्नत की निगाह में

    इमाम हुसैन अ. रसूले इस्लाम स.अ. की ज़बानी

    हर बाप की इच्छा और तमन्ना होती है कि उसका बेटा ऐसा हो कि उसके व्यक्तित्व का उत्तराधिकारी, उसके संदेश का रक्षक और उसके मिशन को आगे बढ़ाने वाला हो। चूंकि इमाम हुसैन अ. ने अपने आंदोलन और अभूतपूर्व बलिदान द्वारा पैगम्बरे इस्लाम स.अ. के संदेश और मिशन को अमर बना दिया है इसलिए पैगम्बर स.अ. आपके बारे में फ़रमाते हैं, मैं हुसैन से हूँ, यानी मेरी रिसालत, मेरे संदेश व मिशन, हुसैन के कारण बाक़ी बचेगा।

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  • इस्लाम को बचाने के लिए इमाम हुसैन अ.ह का बलिदान।

    हज़रत इमाम हुसैन अ. ने अपने रिश्तेदारों और साथियों के साथ इस्लाम को क़यामत तक के लिये अमर बना देने के लिए महान बलिदान दिया है। इस रास्ते में इमाम किसी क़ुरबानी से भी पीछे नहीं हटे, यहां तक ​​कि छः महीने के दूध पीते बच्चे को भी इस्लाम के लिए क़ुरबान कर दिया ताकि इस्लाम बच जाये।

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  • हजरते मासूमा स.अ. का जन्मदिवस।

    हज़रते फ़ातेमा मासूमा स.अ. इस्लामी इतिहास की एक महत्वपूर्ण हस्ती का नाम है। आप शियों के सातवें इमाम, हज़रत इमाम मूसा काज़िम अ.स. की बेटी और आठवें इमाम, हज़रत इमाम रेज़ा अ.स. की बहन हैं आप बहुत छोटी थीं तभी आपके बाबा इमाम मूसा काज़िम अ.स. को शहीद कर दिया गया और आपकी शिक्षा और प्रशिक्षण आपके भाई इमाम रेज़ा अ.स. ने किया

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  • अत्याचारी बादशाहों के दौर में इमाम सादिक़ अ. नें आंदोलन क्यों नहीं किया।

    इमाम सादिक़ अ. के ज़माने के बादशाहों के विरुद्ध होने वाले अक्सर आंदोलनों में इमाम सादिक़ अ. की मर्ज़ी शामिल नहीं थी। और आप आंदोलन के अगुवाओं की ओर की जाने वाली अपील को जो आपकी मदद और सहयोग का वादा करते थे, स्वीकार नहीं करते थे। और अहलेबैत अलैहिस्सलाम की शिक्षाओं को प्रचलित करने को प्राथमिकता देते थे।

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  • आयतुल्लाह ख़ामेनई के बयानात की रौशनी में

    रोज़े के तीन स्टेप

    इस आयत में यह कहा गया है कि अल्लाह नें ईमान वालों पर रोज़ा वाजिब किया है जिस तरह इस्लाम से पहले वाली क़ौमों पर वाजिब किया गया था। जब से इन्सान है और जब तक इन्सान रहेगा बहुत से चीज़ें उसकी ज़रूरत हैं जिनमें से एक इबादत है जिसका एक तरीक़ा नमाज़ है और एक रोज़ा जो रमज़ान के पवित्र महीने में लागू किया गया है।

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  • वह अजनबी कौन था?

    एक कमज़ोर औरत पानी से भरी मश्क बड़ी मुश्किल से ले जा रही थी। रास्ते में उसे एक आदमी मिला उसनें औरत से पानी की मश्क ली और उसके घर का पता पूछ कर आगे आगे चलने लगा। छोटे छोटे बच्चे अकेले घर पर माँ का इन्तेज़ार कर रहे थे। बच्चों नें दूर से माँ को देखा तो दौड़ कर उसके पास आए लेकिन उन्हें यह देख कर आश्चर्य हुआ कि आज पानी की मश्क उनकी माँ के बजाए एक अजनबी आदमी नें उठा रखी थी।

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  • आयतुल्लाह ख़ामेनई के बयानात की रौशनी में

    सहीफ़ए सज्जादिया में रमज़ानुल मुबारक।

    सहीफ़ए सज्जादिया की दुआ 44 में रमज़ानुल मुबारक के बारे में इमाम सज्जाद अ. नें कुछ बातें की हैं आज उन्हीं को आपके सामने बयान करना चाहता हूँ हालांकि यहाँ अपने प्रिय जवानों से यह भी कहना चाहता हूं कि कि सहीफ़ए कि सहीफ़ए सज्जादिया को पढ़ें, इसका अनुवाद पढ़ें, यह हैं तो दुआएं लेकिन इनमें ज्ञान विज्ञान का एक समन्दर है। सहीफ़ए सज्जादिया की सभी दुआओं में और इस दुआ में भी ऐसा लगता है कि एक इन्सान ख़ुदा के सामने बैठा लॉजिकल तरीक़े से कुछ बातें कर रहा है, बस अन्तर यह है कि उसकी शक्ल दुआ है।

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  • आयतुल्लाह ख़ामेनई के बयानात की रौशनी में

    ह़ज़रत अली अलैहिस्सलाम के जीवन की महत्वपूर्ण पहलू।

    ह़ज़रत अली (अ.स) का जीवन दुनिया के तमाम मुसलमानों के लिए एक बहुत बड़ा पाठ है। आप की इबादत हो ख़ुदा के साथ मुनाजात और दुआ हो, दुनिया से मुंह मोड़ना हो, अल्लाह की याद में डूब जाना हो, अपने नफ़्स (अंतरात्मा) और शैतान के साथ लड़ना हो, आप की निजी ज़िन्दगी की हर चीज़ आईडियल है। नहजुल बलाग़ा में आप का मशहुर जुमलाः या दुनिया ग़ुर्री ग़ैरी ऐ दुनिया मुझे धोका देने कि कोशिश न कर, जा मुझे छोड़ के किसी और को धोका दे इस लिए कि अली (अ स) तेरे धोखे में आने वाला नहीं है।

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  • शबे क़द्र के आमाल।

    शबे क़द्र के बारे में कहा गया है कि यह वह रात है जो पूरे साल की रातों से अधिक महत्व और फ़ज़ीलत रखती है, और इसमें किया गया अमल हज़ार महीनों के अमल से बेहतर है शबे क़द्र में साल भर की क़िस्मत लिखी जाती है और इसी रात में फ़रिश्ते और मलाएका नाज़िल होते हैं

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  • हज़रत ख़दीजा पर ख़ुदा का सलाम

    हज़रत ख़दीजा अ. अपनी क़ौम के बीच एक अलग स्थान रखती थीं जिसकी तुलना किसी से नहीं की जा सकती। आपके स्वभाव में नम्रता थी और आपके अख़लाक़ व नैतिकता में भी कोई कमी नहीं थी इसी वजह से मक्के की औरतें आपसे जलती थीं और आपसे ईर्ष्या करती थीं।

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  • इमाम महदी अ.ज. की वैश्विक हुकूमत में हज़रत ईसा अ. की भूमिका।

    वैश्विक हुकूमत की बागडोर हज़रत इमाम महदी के हाथों में होगी और हज़रत ईसा अ. क़ुरआन के मूल्यों को प्रचलित करने में आपकी मदद करेंगे।

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  • इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम का जन्मदिवस।

    इमाम अली इब्ने हुसैन अलैहिमुस्सलाम, ज़ैनुल आबेदीन और सज्जाद के नाम से मशहूर हैं और मशहूर रेवायत के अनुसार आपका जन्म वर्ष 38 हिजरी में शाबान के महीने में मदीना शहर में हुआ। कर्बला की घटना में आप 22 या 23 साल के जवान थे और मुस्लिम इतिहासकारों के अनुसार आप उम्र के लिहाज से अपने भाई अली अकबर अलैहिस्सलाम से छोटे थे।

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پیام امام خامنه ای به مسلمانان جهان به مناسبت حج 2016
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